जन समाचार मंच


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- तपन सेन
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एक मात्र जन विश्वास अधिनियम, 2023 के जरिए कई ऐसे अपराधों के लिए जेल की सजा खत्म कर दी गई है जिनके लिए पहले सजा होती थी। अब केवल जुर्माना देकर अपराधी बच सकता है। यह मुख्य रूप से इसलिए बनाया गया है ताकि मालिक पक्ष श्रम कानूनों का उल्लंघन करने पर जुर्माना देकर आसानी से बच सके। (संपादक-गणशक्ति)
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प्रकाशित: 03 मई 2026 • 9 मिनट पठन

"ब्राज़ील किसी का पिछवाड़ा (backyard) नहीं है—विदेशी हस्तक्षेप और दक्षिणपंथी ताकतों को पछाड़कर वामपंथी 'लूला' की ऐतिहासिक जीत।"
लैटिन अमरीकी देश ब्राज़ील में राष्ट्रपति चुनाव जीतकर लूला ने धुर दक्षिणपंथी ताकतों के उदय को करारी शिकस्त दी है। अमरीकी दबाव और मेटा के एल्गोरिदम जैसे विदेशी हस्तक्षेपों के बावजूद, लूला ने ऐतिहासिक राजनीतिक वापसी की है। पहले दौर में पिछड़ने के बाद, वामपंथी-प्रगतिशील एकजुटता और कार्य सप्ताह घटाने जैसे फैसलों ने उनकी बड़ी जीत तय की। यह नतीजा पूर्व राष्ट्रपति बोल्सोनारो और वाशिंगटन के लिए बड़ा झटका है, हालांकि संसद में दक्षिणपंथियों का दबदबा बना हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी सहित वैश्विक नेताओं ने इस जीत पर बधाई दी है, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगी। लूला ने स्पष्ट किया है कि लोकतंत्र सुरक्षित है और ब्राज़ील किसी भी विदेशी ताकत का पिछलग्गू नहीं बनेगा।
26 अक्टूबर 2026

"फिल्मी परदे के साधारण फ्रेम से निकलकर जो इतिहास के फलक पर अमर हो गया, वही एकमात्र उत्तम है।" यह आलेख बांग्ला सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार की जन्मशती के अवसर पर उनकी कला, लोकप्रियता और सांस्कृतिक प्रभाव का एक गंभीर विश्लेषण है। लेखक संजय मुखोपाध्याय बताते हैं कि बंगाली बुद्धिजीवियों ने लंबे समय तक उत्तम कुमार की लोकप्रियता को लेकर एक संकोच और अविश्वास का भाव रखा, क्योंकि वे इसे संभ्रांत कला के दायरे से बाहर मानते थे। इसके बावजूद, उत्तम कुमार केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि बंगाल की आधुनिकता, मध्यवर्गीय पहचान और सामूहिक सपनों के जीवंत प्रतीक बन गए। हॉलीवुड की मर्लिन मुनरो की तरह उन्होंने भी अपने दौर के सामाजिक और राजनीतिक तनावों के बीच खुद को ढाला। पटकथाओं की सीमाओं से परे जाकर अपने अनूठे अभिनय, देह-भाषा और सहजता से उन्होंने दर्शकों के दिलों पर राज किया। वे भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा बेजोड़ 'नक्षत्र' बनकर उभरे, जिनका प्रभाव आज भी हमारी सांस्कृतिक चेतना में अमिट है।
25 अक्टूबर 2026

"सिनेमा जब केवल मनोरंजन न रहकर विचार का हथियार बन जाता है, तो सत्ता की नींद उड़ना स्वाभाविक है!" यह आलेख सिनेमा को केवल मनोरंजन के बजाय एक गंभीर विचार और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रूप में देखता है। इसमें 'लेनिन' के काल से लेकर स्वतंत्र भारत में ('जवाहरलाल नेहरू' की पहल और 'सत्यजित राय-ऋत्विक घटक के योगदान से) FTII और SRFTI जैसे फिल्म शिक्षण संस्थानों के उदय और उनके इतिहास पर चर्चा की गई है। लेखक 'संजय मुखोपाध्याय' बताते हैं कि कैसे ये संस्थान नए और सचेत फिल्मकार तैयार करते हैं, जो व्यवस्था के सामने उसके खिलाफ सवाल खड़े करते हैं, और यही वजह है कि सत्ता इन सांस्कृतिक केंद्रों पर निरंतर हमले करती है।
16 अक्टूबर 2026

केशव कुमार भट्टड़ • 16 अप्रैल 2026

सदा हिन्दू राष्ट्र और अखंड भारत के गीत गानेवाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में 'विविधता में एकता' और बहुलतावाद का गीत गाया , लेकिन यह उनके वैचारिक बदलाव के बजाय अमेरिकी वीजा प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय विरोध से बचने का एक पैंतरा मात्र दिखता है। एक तरफ वे प्रवासियों को अमेरिका के प्रति वफादार रहने और भारत में सभी समुदायों के साथ रहने की सीख दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर संघ परिवार का आचरण स्पष्ट रूप से बिल्कुल इसके उलट है। अहमदाबाद में ऐनी फ्रैंक और मलाला की किताबें पढ़ने के 'अपराध' में 'बजरंगियों' द्वारा बेरहमी से छात्रों की पिटाई, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध भाजपा नेताओं के घनघोर सांप्रदायिक बयान , आईटी सेल के लगातार जहरीले नफरती अभियान और दलित नेताओं की सभा के बाद स्थल के 'शुद्धिकरण' जैसी घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थापित भारतीय सिद्धांतों की शरण लेना और विरोध प्रदर्शनों के सामने समर्थकों का तीखा आक्रामक रवैया यह साबित करता है कि संघ का यह 'बहुलतावाद' सिर्फ एक मुखौटा है।
केशव कुमार भट्टड़ • 31 अगस्त 2026

फ़िलिस्तीन के हक़ में उठे बोल, मगर आक्रामक इज़राइल पर ब्रिक्स का रुख़ गोल!
ब्रिक्स के 'नई दिल्ली घोषणापत्र 2026' में 1967 की सीमाओं के आधार पर स्वतंत्र फ़िलिस्तीन राष्ट्र की स्थापना और गाजा में तुरंत युद्धविराम का समर्थन किया गया है। घोषणापत्र में मूल निवासियों के जबरन विस्थापन और गाजा के जनसांख्यिकीय स्वरूप को बदलने की कड़ी निंदा की गई है। हालांकि, गाजा में जारी हिंसा, वेस्ट बैंक पर अवैध कब्जे और मानवीय संकट के लिए जिम्मेदार इज़राइल का नाम लेने से सीधे तौर पर परहेज किया गया है। इस कारण फ़िलिस्तीन के अधिकारों की पैरोकारी के बावजूद, आक्रमणकारी की सीधी जवाबदेही तय करने के मामले में ब्रिक्स की सीमाएं उजागर होती हैं।
केशव कुमार भट्टड़ • 14 सितंबर 2026
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