
"भाजपा के शासनकाल में खुलेआम भ्रष्टाचार चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यकाल में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, यह उसका केवल एक छोटा सा हिस्सा है।"
नॉर्वे एक ऐसा देश है, जहाँ फियर्ड का पानी आसमान का रंग ले लेता है। जहाँ वाइकिंग की कहानियाँ आज भी हवाओं में तैरती हैं। और फ्रांस — एक ऐसा देश, जिसने कई बार सिखाया है कि क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है।
फुटबॉल एक ऐसा आईना है, जिसमें दुनिया खुद को देखती है। आज उस आईने में हम जो देख रहे हैं, वह सिर्फ एक खेल का बदलना भर नहीं है।
सरफराज आलम द्वारा जारी दस्तावेजों से पता चलता है कि उन्होंने फरवरी-मार्च के महीने में ही सूचना के अधिकार (RTI) के तहत कोलकाता बंदरगाह प्राधिकरण से पूछा था कि तारातल्ला के दुर्घटनास्थल की जमीन पर निर्माण कौन कर रहा है, जमीन किसे लीज पर दी गई है और क्या इसके लिए एनओसी (NOC) दी गई है। लेकिन आरटीआई के तहत उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया।
फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।
इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।
“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।
बच्चों की भूख को हम जो मिटा नहीं पाए हैं, उसका एक बड़ा कारण यह है कि परियोजना शुरू होने के बावजूद, नवउदारवाद के दौर में सरकारी नीतियां इसके विपरीत दिशा में चली गईं।
ब्लॉग
अफ्रीका के 54 सदस्य देशों के फुटबॉल विकास के लिए लगातार कड़ी मेहनत की गई है। युवा विकास, कोचिंग और बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ सुशासन (गुड गवर्नेंस), वित्तीय पारदर्शिता और ऑडिट प्रणाली में सुधार के परिणामस्वरूप नए प्रायोजक (स्पॉन्सर्स) और भागीदार (पार्टनर्स) जुड़े हैं। इससे अफ्रीकी फुटबॉल और भी मजबूत हुआ है।
राज्य
उसी सुवेंदु ने तृणमूल का झंडा समेट कर अमित शाह के पैरों में डाल दिया। भाजपा का नेता बन गया। लेकिन लाल झंडे को खत्म नहीं कर सके, क्योंकि सीपीआई(एम) का एक आदर्श है। लक्ष्य है। कार्यक्रम है। यह किसी दादा-दीदी की पार्टी नहीं है।"
राष्ट्रीय
वोट चोरी, एसआईआर (SIR) के खिलाफ भी विरोध प्रदर्शन हो: दीपके
राज्य
धार्मिक अल्पसंख्यकों को संकट में डालने के लिए आरएसएस की योजना के अनुसार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की संयुक्त गतिविधियों के क्रियान्वयन को समझाते हुए सलीम ने कहा कि देश के विभाजन का दंश झेलने के बावजूद पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक विभाजन नहीं था। लेकिन पंद्रह वर्षों में ममता बनर्जी के कुशासन के खिलाफ लोगों में जो गुस्सा पैदा हुआ था, भाजपा ने उसे तृणमूल विरोधी गुस्से के बजाय मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक गुस्से में बदल दिया।
विश्लेषण
के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में कृषि क्षेत्र में 10,546 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें से 5,933 लोग खेतिहर मजदूर थे, जो कुल मौतों का 56.3 प्रतिशत है।
राष्ट्रीय
"अब समय आ गया है कि जनता को अतीत की याद दिलाई जाए।" उनके शब्दों में, "यह विरोध सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं है। यह आंदोलन अब छात्र-छात्राओं के खिलाफ हुई कई संगठित घटनाओं के विरोध का मंच बन चुका है।"
जनसंघर्ष
संथाल विद्रोह का मुख्य केंद्र 'दामिन-इ-कोह' था। इस शब्द का अर्थ है 'पहाड़ का आंचल' या 'पहाड़ का दुपट्टा'। पहाड़ों और जंगलों से घिरे राजमहल के आस-पास के इलाके से होकर ही मध्यकाल में आक्रमणकारियों ने बंगाल में प्रवेश किया था। उस क्षेत्र की जनजातीय आबादी कृषि कार्य में अभ्यस्त नहीं थी।
राज्य
जिन लोगों ने भाजपा को रोकने के लिए तृणमूल कांग्रेस को वोट देने की बात कही थी , वे ही चुनाव जीतकर पिछले दरवाजे से एनसीपीआई (NCPI) नाम से पार्टी बनाकर भाजपा में शामिल हो गए हैं।
राष्ट्रीय
"भाजपा के शासनकाल में खुलेआम भ्रष्टाचार चल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के कार्यकाल में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, यह उसका केवल एक छोटा सा हिस्सा है।"
विश्लेषण
नॉर्वे एक ऐसा देश है, जहाँ फियर्ड का पानी आसमान का रंग ले लेता है। जहाँ वाइकिंग की कहानियाँ आज भी हवाओं में तैरती हैं। और फ्रांस — एक ऐसा देश, जिसने कई बार सिखाया है कि क्रांति सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि फुटबॉल की घास पर भी होती है।
ब्लॉग
फुटबॉल एक ऐसा आईना है, जिसमें दुनिया खुद को देखती है। आज उस आईने में हम जो देख रहे हैं, वह सिर्फ एक खेल का बदलना भर नहीं है।
राज्य
सरफराज आलम द्वारा जारी दस्तावेजों से पता चलता है कि उन्होंने फरवरी-मार्च के महीने में ही सूचना के अधिकार (RTI) के तहत कोलकाता बंदरगाह प्राधिकरण से पूछा था कि तारातल्ला के दुर्घटनास्थल की जमीन पर निर्माण कौन कर रहा है, जमीन किसे लीज पर दी गई है और क्या इसके लिए एनओसी (NOC) दी गई है। लेकिन आरटीआई के तहत उन्हें कोई जवाब नहीं दिया गया।
सिनेमा
फिल्म का रीढ़ कंपा देने वाला हिस्सा यह संवाद है जो भारतीय समाज की उस गहरी नस को छूता है जिसे सदियों से 'नियतिवाद' (Fatalism) और 'यथास्थितिवाद' (Status Quo) के नाम पर सींचा गया है। 'माई' का यह तर्क केवल एक सरलचित्त माँ का विचार नहीं है, बल्कि यह भारतीय मानसिकता में गहरे तक पैठी उस सामाजिक कंडीशनिंग (Conditioning) का दस्तावेज़ है जो शोषण को भी 'ईश्वरीय विधान' मानकर स्वीकार कर लेती है।
इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।
“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।
राज्य
बच्चों की भूख को हम जो मिटा नहीं पाए हैं, उसका एक बड़ा कारण यह है कि परियोजना शुरू होने के बावजूद, नवउदारवाद के दौर में सरकारी नीतियां इसके विपरीत दिशा में चली गईं।
जनसंघर्ष
राज्य भर में इतिहास के विकृतिकरण के खिलाफ और खुद मुख्यमंत्री द्वारा झूठी तथा भ्रामक जानकारी फैलाने के खिलाफ कलकत्ता विश्वविद्यालय के छात्रों की विरोध सभा!
अतिथि लेखन
पलाशी के मैदान ने हमें सिखाया था — गद्दारी करने से कौम तबाह हो जाती है। आज की तमन्नाएँ हमें सिखा रही हैं — बच्चों के खून से खेलने पर भविष्य तबाह हो जाता है। पलाशी के साज़िशकर्ताओं से हम नफ़रत करते हैं। और आज के समाज के दुश्मन कौन हैं? जो बच्चों की लाशों पर राजनीति करते हैं, जो सांप्रदायिकता का ज़हर फैलाते हैं, जो बुलडोज़र से गरीबों के सपने तोड़ते हैं — वही आज के मीरजाफ़र हैं, वही आज के गद्दार हैं!
ब्लॉग
• क्यों दुनिया की सबसे उपजाऊ फुटबॉल भूमि होने के बावजूद अफ्रीका विश्व फुटबॉल का मालिक नहीं है?
• क्यों प्रतिभाएं लागोस, डकार, कैसाब्लांका और आबिदजान में पैदा होती हैं; मगर उनकी कीमत लंदन, पेरिस और ज्यूरिख में तय होती है?
• क्यों अफ्रीका के किशोर धूल-मिट्टी के मैदानों में गेंद के साथ बड़े होते हैं, और उनके जीवन के सबसे बेहतरीन साल यूरोपीय क्लब-साम्राज्य के झंडे के नीचे बीतते हैं?
हास्य-व्यंग
बंगाल की राजनीति गंभीर विमर्श का विषय है, मनोरंजन का नहीं। शुक्र है कि राज्य में 'लेफ्ट' है, कोने-कोने में है और पूरे लय में है। तपे -तपाए जमीन से जुड़े वाम नेता हैं। प्रगतिशील युवा और संगठित टीम हैं। बंगाल की जन-चेतना के लिए 'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' ही अंतिम बात है। और यह देश के लिए भी सच है।
पिछले 15 सालों तक बंगाल की राजनीति की बेताज बादशाह रहीं ममता बनर्जी और उनके उत्तराधिकारी अभिषेक बनर्जी के लिए यह समय "माया मिली न राम" जैसा है। भाजपा के साथ बाइनरी सेटिंग की राजनीति में झूला झूलते हुए जिस भतीजे (भाइपो) को दीदी ने पूरी पार्टी सौंपने की कसम खाई थी, आज वही अभिषेक बनर्जी पार्टी से 'सस्पेंड' कर दिए गए हैं और ममता दीदी को अध्यक्ष पद से ही 'मुक्त' कर दिया गया है। ऑफर है मार्गदर्शक बनने का। उफ्फ़। याद आया- अँखियों से लौह-नीर पिघलाते लौह-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी, वफ़ा जिनसे की, बेवफा हो गए..। विधायकों के कथित जाली हस्ताक्षरों के विवाद ने ऐसा मोड़ लिया कि कालीघाट के किले में अब केवल सन्नाटा और गिने-चुने वफादार बचे हैं। कल तक हुँकार भरने वाली दीदी अब कल्याण बाबू के सहारे कोर्ट-कचहरी के चक्कर और तारीख पर तारीख। राजनीति का यह कैसा दौर आया है, जहां 'खेला होबे' का नारा देने वालों के साथ ही 'महा-खेला' हो गया!
ब्लॉग
लैटिन अमेरिका दुनिया के नक्शे पर लंबे समय से संसाधनों का भंडार तो रहा है, लेकिन सत्ता का केंद्र नहीं। सोना उत्तर की ओर गया, चांदी उत्तर की ओर गई, श्रम उत्तर की ओर गया, मुनाफा उत्तर की ओर गया। इस महाद्वीप को कई बार यह सिखाया गया है कि उसे केवल पीछे चलना है, नेतृत्व नहीं करना है।
राज्य
बजट के बाद चाय बागान श्रमिकों के नेता विकास महाली ने सवाल उठाया है कि उत्तर बंगाल के तीन लाख से अधिक चाय श्रमिकों की मजदूरी, बकाया पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी की मांग को क्यों नजरअंदाज कर दिया गया?
राज्य
अल्पसंख्यक विकास विभाग और मदरसा शिक्षा के लिए वर्ष 2025 में 5713 करोड़ रुपये का बजट था। इस बार के बजट में यह आवंटन 2165 करोड़ रुपये है। एक झटके में बजट को 3548 करोड़ रुपये कम कर दिया गया! प्रधानमंत्री बार-बार कहते हैं, "सबका साथ, सबका विकास"। आज के बजट में उस बात की झलक कहाँ है?
राज्य
जब बुलडोजर चलता है तो कोई धर्म या जाति नहीं देखी जाती। उस समय केवल दो ही श्रेणियां सामने होती हैं— कॉरपोरेट और गरीब। नतीजतन, जब बुलडोजर चलता है, तो हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग प्रभावित होते हैं।
राज्य
कोलकाता के सोहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलने के फैसले पर माकपा (सीपीआई-एम) ने राज्य की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया है। पार्टी ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए इसे तुरंत रद्द करने की मांग की है। माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने इसका तीव्र प्रतिवाद करते हुए कहा कि सत्ताधारी दल को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को प्रचार का हथियार बनाना बंद करना चाहिए।
राज्य
एक तरफ कुछ ही भूस्वामियों के हाथ में अधिकांश जमीन का कब्जा बरकरार है, तो दूसरी तरफ लाखों भूमिहीन और गरीब किसानों की भूमि की मांग पूरी नहीं हुई है। परिणामस्वरूप, भूमिहीन किसान किसी भी शर्त पर जमीन के एक टुकड़े के लिए पूरी तरह से भूस्वामियों पर निर्भर हो जाते हैं।
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