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वह महाद्वीप जो अब अनुमति नहीं मांगता- शमीक लाहिड़ी

राजीव कुमार पाण्डेय24 जून 20267 मिनट पठन12 बार पढ़ा गया

• क्यों दुनिया की सबसे उपजाऊ फुटबॉल भूमि होने के बावजूद अफ्रीका विश्व फुटबॉल का मालिक नहीं है?

• क्यों प्रतिभाएं लागोस, डकार, कैसाब्लांका और आबिदजान में पैदा होती हैं; मगर उनकी कीमत लंदन, पेरिस और ज्यूरिख में तय होती है?

• क्यों अफ्रीका के किशोर धूल-मिट्टी के मैदानों में गेंद के साथ बड़े होते हैं, और उनके जीवन के सबसे बेहतरीन साल यूरोपीय क्लब-साम्राज्य के झंडे के नीचे बीतते हैं?

वह महाद्वीप जो अब अनुमति नहीं मांगता- शमीक लाहिड़ी

दुनिया के नक्शे पर अफ्रीका को पहले बंदूकों ने काटा, फिर स्केल ने।

1884 के बर्लिन में कुछ यूरोपीय लोगों ने एक महाद्वीप को आपस में ऐसे बांट लिया, मानो वह इंसानों की मातृभूमि न होकर, विरासत में मिली उनकी कोई निजी संपत्ति हो। नदियों की भाषा नहीं पूछी गई। मरुस्थल की स्मृतियों से कोई सवाल नहीं किया गया। इंसानों की राय तो खैर दूर की बात थी। कागज पर स्केल से खींची गई रेखाएं ही बाद में सीमाएं बन गईं। और उस सीमा की छाया आज भी अफ्रीका के देशों, अर्थव्यवस्था, राजनीति और यहाँ तक कि फुटबॉल के मैदान पर भी देखी जा सकती है।

जब विश्व कप आता है, तो दुनिया कहती है कि यह सिर्फ एक खेल है। लेकिन दुनिया खुद जानती है कि यह झूठ है। विश्व कप दरअसल सत्ता का प्रदर्शन है। संपदा का मानचित्र है। इतिहास का महज एक पुनर्मंचन है। और उस मंच पर अफ्रीका हर बार एक सवाल बनकर खड़ा होता है!

• क्यों दुनिया की सबसे उपजाऊ फुटबॉल भूमि होने के बावजूद अफ्रीका विश्व फुटबॉल का मालिक नहीं है?

• क्यों प्रतिभाएं लागोस, डकार, कैसाब्लांका और आबिदजान में पैदा होती हैं; मगर उनकी कीमत लंदन, पेरिस और ज्यूरिख में तय होती है?

• क्यों अफ्रीका के किशोर धूल-मिट्टी के मैदानों में गेंद के साथ बड़े होते हैं, और उनके जीवन के सबसे बेहतरीन साल यूरोपीय क्लब-साम्राज्य के झंडे के नीचे बीतते हैं?

फुटबॉल के वैश्वीकरण ने बहुत कुछ बदला है, लेकिन सत्ता के भूगोल को नहीं।

आज के बड़े क्लब अब केवल क्लब नहीं रहे। वे साम्राज्य हैं। उनका अपना मीडिया है, अपना बाजार है, अपनी एक अलग दुनिया है। दुनिया के हर प्रतिभाशाली बच्चे के लिए उनके दरवाजे खुले हैं। अफ्रीका के लिए यह एक साथ वरदान भी है और अभिशाप भी। एक तरफ ये क्लब अफ्रीका के बच्चों को विश्व मंच पर लाते हैं, तो दूसरी तरफ अफ्रीका के मैदानों को खाली कर देते हैं। प्रतिभा चली जाती है, पूँजी वहीं रह जाती है। फुटबॉलरों का निर्यात होता है, लेकिन उनके अपने देशों में बुनियादी ढांचा विकसित नहीं हो पाता। यह महाद्वीप खिलाड़ियों की आपूर्ति तो करता है, मगर फुटबॉल उद्योग का मालिक नहीं बन पाता।

यह कुछ नया नहीं है।

एक समय था जब अफ्रीका सोना, हीरा, रबर, कॉफी – और उससे भी पहले दासों (गुलामों) का निर्यात करता था। आज वह फुटबॉल प्रतिभाओं का निर्यात करता है। लगभग एक सदी पहले रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'अफ्रिका' कविता में लिखा था - "आए वे मानव-शिकारी" (एल मानुष-धरार दल)। उस कविता का अफ्रीका जंजीरों में जकड़ा हुआ, लुटा हुआ और अपमानित महाद्वीप था। आज विश्व कप के मैदान पर उसी अफ्रीका के वंशज अपने पैरों में गेंद थामे इतिहास का करारा जवाब लिख रहे हैं।

भले ही उत्पाद (फुटबॉलर अब महज एक उत्पाद हैं) बदल गया हो, लेकिन ढांचा नहीं बदला। फिर भी, इतिहास कभी एकतरफा रास्ता नहीं होता।

2026 के विश्व कप में अफ्रीका एक बार फिर उसी ऊँच-नीच के ढांचे के खिलाफ अपने अस्तित्व की घोषणा कर रहा है।

• मोरक्को ने ब्राजील को रोका है।

• घाना ने जीत के साथ शुरुआत की है।

• कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य ने पुर्तगाल को बराबरी पर रोक दिया है।

• मिस्र को लंबे समय से प्रतीक्षित जीत का स्वाद मिला है।

• और केप वर्डे; अटलांटिक के सीने पर जमीन का एक छोटा सा बिंदु। स्पेन और उरुग्वे के सामने खड़े होकर वह कह रहा है — दुनिया में कुछ चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें जनसंख्या या जीडीपी (GDP) से नहीं नापा जा सकता।

ये परिणाम शायद ट्रॉफी न दिला पाएं, लेकिन ये सदियों पुराने वर्गीकरण और भेदभाव को चुनौती दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि फुटबॉल का इतिहास यूरोप की बपौती नहीं है। अफ्रीका की कहानी भी सिर्फ अफ्रीका की जर्सी तक सीमित नहीं है। वह मैदान पर कई और झंडे पहनकर उतरता है। फ्रांस की जर्सी में किलियन एम्बाप्पे। स्पेन की जर्सी में लामिन यामाल। बेल्जियम की जर्सी में जेरेमी डोकू। और न जाने कितने ही नाम… उनके पैरों के साथ अफ्रीका का इतिहास भी दौड़ता है।

लेकिन यहाँ भी एक सवाल इंतजार कर रहा है। क्यों अफ्रीका की कई बेहतरीन प्रतिभाएं आखिरकार यूरोपीय राष्ट्रीय टीमों की जर्सी पहनती हैं? इसका जवाब हमेशा व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का नहीं होता – बल्कि अवसरों, परिस्थितियों, बुनियादी ढांचे, नागरिकता और इतिहास का होता है।

प्रवासन (इमिग्रेशन) की कहानी ही फुटबॉल की कहानी है।

जो परिवार कभी गरीबी, युद्ध या भविष्य की तलाश में भूमध्य सागर पार कर आए थे, उनके बच्चे आज स्टेडियमों के नायक हैं।

भूमध्य सागर पार करते समय एक अफ्रीकी युवक को अक्सर 'घुसपैठिया' कहा जाता है। लेकिन अगर उसका बेटा विश्व कप के सेमीफाइनल में विजयी गोल दाग देता है, तब उसे 'देश का गौरव' कहा जाता है। फुटबॉल इतिहास के इस व्यंग्य को भूलता नहीं है। सीमाएं इंसानों को बांट सकती हैं, प्रतिभा को नहीं।

अफ्रीकियों के पैरों के नीचे घूमती हुई गेंद में सिर्फ खेल की कहानी नहीं है। इसमें दास-जहाजों के अंधेरे तहखाने हैं। कांगो की लहूलुहान खदानें हैं। रॉबेन द्वीप की जेल है। साहेल के धूल भरे तूफान हैं। केप वर्डे का समंदर है। डकार का बंदरगाह है। कैसाब्लांका के सपने हैं।

विश्व कप की रोशनी जब मैदान पर पड़ती है, तो दुनिया ग्यारह फुटबॉलरों को देखती है। इतिहास बहुत कुछ और देखता है। वह उस महाद्वीप को देखता है, जिसे सदियों तक लूटा गया, मगर जो आज भी अपने पैरों से कविता लिखना जानता है।

यूसेबियो से लेकर पेले तक। रोजर मिला से लेकर जॉर्ज वेआ तक। मोहम्मद सालाह से लेकर सादियो माने तक। अशरफ हकीमी से लेकर लामिन यामाल तक। यह निरंतरता कोई संयोग नहीं है। यही इतिहास का लंबा प्रतिरोध है। यहीं पर फुटबॉल हमारे समय के एक गहरे विरोधाभास को उजागर करता है।

यूरोप के कई देशों में आज प्रवासियों के खिलाफ संदेह, डर और नफरत को राजनीतिक एजेंडा बनाया जा रहा है। लेकिन विश्व कप के मैदान पर उन्हीं देशों का झंडा थामे इन प्रवासी परिवारों के बच्चे दौड़ रहे होते हैं। जिनकी मौजूदगी को राजनीतिक मंचों पर 'समस्या' बताया जाता है, उन्हीं के कंधों पर राष्ट्रीय गौरव का सबसे बड़ा सपना सौंप दिया जाता है।

विश्व फुटबॉल की नियामक संस्था फीफा (FIFA) खुद को वैश्विक कहती है। लेकिन विश्व फुटबॉल का आर्थिक और राजनीतिक केंद्र केवल यूरोप ही क्यों है, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है!

विश्व कप में अफ्रीका के लिए सीटें बढ़ी हैं। यह निसंदेह महत्वपूर्ण है। लेकिन प्रतिनिधित्व और सत्ता दो अलग चीजें हैं। मेज पर एक कुर्सी मिल जाना और मेज के नियम लिखने का अधिकार मिल जाना, एक बात नहीं है।

इसी वजह से अफ्रीका का विश्व कप केवल गोल, अंक या ग्रुप-तालिका की कहानी नहीं है।

यह आत्मसम्मान की कहानी है।

यह दृश्यता (विजिबिलिटी) की कहानी है।

यह उन लोगों की कहानी है, जिनसे लंबे समय तक कहा गया — "तुम नहीं कर पाओगे।"

और जिन्होंने बार-बार जवाब दिया — "देख लेते हैं।"

शायद इस बार भी ट्रॉफी अफ्रीका न जाए।

अफ्रीका की सबसे बड़ी उपलब्धि ट्रॉफी की धातु में नहीं, बल्कि उसकी स्थिति (पोजिशन) में है।

एक समय था जब अफ्रीका एक मेहमान था। अब वह दावेदार है। एक समय था जब अफ्रीकी टीम की जीत एक अजूबा होती थी। अब वह एक उम्मीद है।

एक समय था जब दुनिया अफ्रीकी फुटबॉलरों को नहीं जानती थी। आज दुनिया के सबसे बड़े क्लबों की रीढ़ उन्हीं पर टिकी है।

फुटबॉल दुनिया को नहीं बदलता, लेकिन दुनिया के बदलाव को साफ दिखाता है। यह विश्व कप उसी दृश्यता का एक और अध्याय है।

अफ्रीका अभी विश्व फुटबॉल के सिंहासन पर नहीं बैठा है। लेकिन अब वह दरवाजे पर खड़ा होकर अनुमति भी नहीं मांग रहा है। वह घर के भीतर दाखिल हो चुका है। और इतिहास गवाह है — जो एक बार घर के अंदर आ जाते हैं, उन्हें हमेशा के लिए हाशिए पर नहीं धकेला जा सकता।

रवींद्रनाथ ने जिस 'मानहारा मानवी' (अपमानित मानवी) की बात लिखी थी, विश्व कप की हरी घास पर आज उसी की संतानें दौड़ रही हैं। इतिहास के अपमान को वे भूले नहीं हैं; वे गोल, ड्रिबल और जीत से उसका प्रतिशोध ले रहे हैं। उन्होंने धीरे-धीरे अपने लंबे अपमान को सपनों में बदलना सीख लिया है।

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शमीक लाहिड़ी

23 जून, 2026

{ लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद,'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं}

अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय

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