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नीट महाघोटाला: क्या 'सस्ते' चरित्र और 'महंगे' पँचों की बलि चढ़ेगा देश का भविष्य? - केशव भट्टड़

केशव कुमार भट्टड़16 मई 20267 मिनट पठन171 बार पढ़ा गया
नीट महाघोटाला: 'डार्लिंग' से 'डेथ' तक का मंजर 

"22 लाख से अधिक छात्रों की आँखों के सपने, होनहार युवाओं की जलती चिता, और पर्चे के बदले अस्मत माँगते 'गुरु' का घिनौना चेहरा— यह है उस परीक्षा का सच, जिसे देश 'डॉक्टर' बनाने के लिए करवाता है। जब तंत्र की लापरवाही और धन की हवस हद पार कर जाए, तो शिक्षा का मंदिर श्मशान और व्यापार की मंडी बन जाता है।
आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती। यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है? नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली को नहीं, बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है। जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों, अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

नीट महाघोटाला 

शिक्षा के 'मंदिरों' में वासना, व्यापार और श्मशान का वीभत्स संगम

*

केशव भट्टड़ 

देश के 22 लाख से अधिक छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाने वाले नीट-यूजी पेपर लीक कांड की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, व्यवस्था का घिनौना और शर्मनाक चेहरा सामने आ रहा है। अलग-अलग राज्यों से आई खबरें इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा अब योग्यता की नहीं, बल्कि बेईमानी, हवस और व्यापार की मंडी बन चुकी है। सनद रहे कि 3 मई  को हो चुकी परीक्षाएं पेपर लीक की खबरों के बीच 7 मई को रद्द कर दी गई थी । सरकार और देश का मीडिया चुनावों के बाद राज्यों में किसकी सरकार बनेगी, उसमें उलझा हुआ था।  

जलती चिता, वासना और व्यापार 

  • राजस्थान (कोटा/बाड़मेर): पहली खबर एक होनहार छात्र प्रदीप माहिच की दर्दनाक आत्महत्या की है। परीक्षा देने के बाद प्रदीप बेहद उत्साहित था, उसने घर आकर कहा था कि उसे 650 नंबर मिलेंगे और सरकारी कॉलेज में सीट पक्की है। लेकिन 7 मई को पेपर लीक की खबर और फिर 12 मई को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा परीक्षा रद्द किए जाने के सदमे को वह बर्दाश्त नहीं कर पाया। जिस व्यवस्था की लापरवाही के कारण परीक्षा रद्द हुई, उसने प्रतिभावान छात्र की जान ले ली। दिल्ली की 20 वर्षीय अंशिका पांडेय , उत्तरप्रदेश का 21 वर्षीय राकेश मिश्र, गोवा (निवासी: कर्टोरिम, मडगांव) का 17 वर्षीय छात्र भी इसी सूची में है।  सभी परीक्षार्थी साधारण /निम्न वित्त परिवारों से हैं, जिनके लिए घरवालों नें घर, खेत, गहने गिरवी रखकर अपने बच्चों को डॉक्टर बनाने का सपना देखा था। सिस्टम ने प्रतिभाओं को निगल लिया। 

  • लखनऊ (उत्तर प्रदेश): दूसरी खबर नैतिकता के पतन की पराकाष्ठा है। लखनऊ विश्वविद्यालय का एक प्रोफेसर (जो अब गिरफ्तार हो चुका है) अपनी ही एक छात्रा को फोन पर प्रलोभन देते हुए कहता है— "दो प्रश्न-पत्र रखे हैं डार्लिंग, घर आ जाओ!" छात्रा कहती रही कि उसकी तैयारी पूरी है, वह केवल रिवीज़न कर रही है, लेकिन गुरु के चोगे में छिपा वह दरिंदा परीक्षा से पहले उसे घर बुलाने का दबाव डालता रहा। नीट काँड का खुलासा हुआ तो छात्रा ने 'दो प्रश्न-पत्र' का दावा करने वाले प्रोफेसर की सूचना पुलिस को दे दी। जाँच के लिए रिकार्ड कॉल किया छात्रा का फोन अब पुलिस के पास है, और प्रोफेसर गिरफ्तार। शिक्षा के मंदिर में पेपर लीक की ताकत के दम पर अस्मत का सौदा करने का यह आरोप झकझोर देने वाला है।

  • पुणे (महाराष्ट्र): तीसरी खबर इस पूरे सिंडिकेट के 'मास्टरमाइंड' की है। पुणे के एक कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर पी.वी. कुलकर्णी (मूल निवासी लातूर) को सीबीआई ने इस पूरे कांड का 'किंगपिन' मानकर गिरफ्तार किया है। कुलकर्णी एनटीए की प्रश्नपत्र निर्माण प्रक्रिया से किसी तरह जुड़ा था। उसने अपनी सहयोगी मनीषा वाघमारे के साथ मिलकर अपने पुणे स्थित घर में एक गुप्त 'दुर्नीति का कारखाना' (सीक्रेट कोचिंग) खोल रखा था। छात्रों को कोई प्रिंटेड या डिजिटल कॉपी नहीं दी जाती थी, बल्कि घर बुलाकर हाथ से लिखे लीक प्रश्नपत्र रटवाए जाते थे और बदले में करोड़ों की कमाई होती थी।

आस्था, राजनीति और बेईमानी का संगम

जब देश की सबसे बड़ी परीक्षा इस तरह तार-तार हो रही हो, तब कुछ बेहद कड़वे और सुलगते सवाल हमारे सामने खड़े होते हैं।

22 लाख छात्रों से दगा और सरकार की 'दिव्य' लापरवाही

22 लाख छात्र दिन-रात एक करके, अपने माता-पिता की खून-पसीने की , पीढ़ियों की कमाई कोचिंग संस्थानों में झोंककर डॉक्टर बनने का सपना देखते हैं। लेकिन सरकार और उसकी लाडली संस्था एनटीए (NTA) इतनी 'सक्षम' निकली कि देश की सबसे गोपनीय परीक्षा की शुचिता भी नहीं बचा सकी। सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि जब तक पानी सिर से ऊपर नहीं गुजर जाता, तब तक वे "सब चंगा सी" के मोड में रहते हैं। जब छात्र आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं, तब जाकर कुंभकर्णी नींद टूटती है। क्या यह व्यवस्था इतनी पंगु हो चुकी है कि वह चंद मुनाफाखोरों के सिंडिकेट के आगे सरेंडर कर दे?

क्या धर्म जीवन से गायब होकर सिर्फ राजनीति का खिलौना बन कर रह गया है?

आजकल देश में धार्मिक राजनीति की बड़ी जय-जयकार हो रही है। हर बात में धर्म, राष्ट्रवाद और संस्कृति का तड़का लगाया जाता है। लेकिन नीट घोटाले ने यह आईना दिखा दिया है कि धर्म अब केवल चुनावी रैलियों, पोस्टरों और भाषणों तक सीमित रह गया है; मानव जीवन और व्यक्तिगत आचरण से वह पूरी तरह गायब है। यदि समाज में रत्ती भर भी धार्मिक या नैतिक चेतना बची होती, तो एक शिक्षक अपनी छात्रा से प्रश्नपत्र के बदले 'शारीरिक सौदेबाजी' की हिम्मत नहीं करता। प्रश्न पत्र लीक कर परीक्षा को काले धन का कारोबार नहीं बनाया जाता। 

क्या यही है आज की राजनीति का हासिल ?

बड़ा दांव इस बात पर है कि 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान' हो रहा है। लेकिन क्या इस तथाकथित संप्रदायों की राजनीति का अंतिम हासिल यही है कि हमारे युवा डिप्रेशन में आकर फाँसी के फंदे पर झूल जाएँ ? क्या इस राजनीति ने एक ऐसा समाज तैयार कर दिया है जहाँ ऊपरी तौर पर तो धार्मिक नारे गूँज रहे हैं, लेकिन भीतर 'बेईमानी की कमाई की हवस' और अँधाधुंध धन कमाने की भूख नाच रही है ? जाहिर है, नीट के पेपर इसलिए लीक नहीं हुए थे कि देश में धर्म का उत्थान करना था, बल्कि इसलिए लीक हुए थे ताकि भ्रष्टाचार के माननियों को करोड़ों रुपये का चढ़ावा चढ़ाया जा सके। जब धर्म का इस्तेमाल सिर्फ सत्ता पाने के लिए किया जाता है, तो समाज का नैतिक ढांचा इसी तरह ढहता है, जैसा लखनऊ और पुणे के प्रोफेसरों ने ढहाया।

क्या जांच सही दिशा में है ?

सीबीआई ने लखनऊ और लातूर/पुणे के प्रोफेसरों को दबोचा है, राजस्थान पुलिस ने भी गिरफ्तारियां की हैं। पहली नजर में लगता है कि जाँच आगे बढ़ रही है। लेकिन यह केवल उन प्यादों और बिचौलियों पर कार्रवाई है जो सामने दिख रहे हैं। असली सवाल यह है कि प्रश्नपत्र बनाने और छपने वाली शीर्ष जगहों पर बैठे महा-मगरमच्छों तक क्या कानून के हाथ कभी पहुंचेंगे ? पिछले दस सालों में करीबन 100 बड़ी परीक्षाएं इस तरह 'डिस्टर्ब' हुई है और उनमें से लगभग 50 परीक्षाएं फिर-से ली गई हैं। क्या जाँच एजेंसियाँ केवल इन छोटे 'कोचिंग माफियाओं' को पकड़कर इति-श्री कर लेंगी या उस बड़े नेक्सस को तोड़ेगी जो सीधे एनटीए के गलियारों से जुड़ा है ? अगर केवल नीचे के स्तर पर लीपापोती हुई, तो इसे सही दिशा नहीं, बल्कि 'डैमेज कंट्रोल स्ट्रैटजी' कहा जाएगा। क्या यह सब नॉर्मल है ?

यह काँड दिखाता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली और नैतिक ताना-बाना पूरी तरह सड़ चुका है। जब तक परीक्षाओं को सिर्फ एक 'बिजनेस' और संप्रदायों को 'वोट बैंक' समझा जाता रहेगा, तब तक सस्ते चरित्र के महंगे पँच देश के भविष्य की बलि लेने से नहीं चूकेंगे, प्रदीप माहिच, अंशिका पांडेय , राकेश मिश्र और गोवा के उस छात्र जैसे होनहार छात्र बेपरवाह सिस्टम की बलि चढ़ते रहेंगे और लीक 'क्वेश्चन पेपर' के बदले धन बटोरने और अस्मत मांगने वाले 'गुरु' समाज को कलंकित करते रहेंगे। 

. . 

यह भी पढ़ें: नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

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संबंधित खबर : नीट पेपर लीक का 'मास्टरमाइंड' निकला NTA का अधिकारी

सभी फोटो, कार्टून साभार । 

अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

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केशव कुमार भट्टड़20 मई 2026

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केशव कुमार भट्टड़24 मई 2026