फुटबॉल एक ऐसा आईना है, जिसमें दुनिया खुद को देखती है। आज उस आईने में हम जो देख रहे हैं, वह सिर्फ एक खेल का बदलना भर नहीं है।
वाम की आवाज़
जन समाचार मंच
जब सांबा के पैरों में जंजीरें पड़ती हैं- शमीक लाहिड़ी
एक समय था जब फुटबॉल ने दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दिया था।एक तरफ थी ताकत, तो दूसरी तरफ थी खूबसूरती।एक तरफ थे कारखाने, तो दूसरी तरफ था कार्निवल।एक तरफ था यूरोप, तो दूसरी तरफ था लैटिन अमेरिका।
बेशक, हकीकत कभी इतनी सीधी नहीं थी। फिर भी दुनिया के करोड़ों लोगों की कल्पनाओं में यह द्वंद्व लंबे समय तक जिंदा रहा। क्योंकि फुटबॉल उन दुर्लभ क्षेत्रों में से एक था, जहाँ इतिहास के हाशिए पर धकेल दिए गए लोग भी साम्राज्यवाद की आँखों में आँखें डालकर खड़े हो सकते थे।
लैटिन अमेरिका ने सिर्फ फुटबॉल खेला नहीं; उसने इसका पुनर्निर्माण किया।अंग्रेज इस खेल को बंदरगाहों तक लेकर आए थे। लेकिन जब यह खेल बंदरगाहों को छोड़कर अश्वेत मजदूरों के आँगनों, इतालवी प्रवासियों की बस्तियों, एंडीज पर्वत की तलहटी और कैरिबियाई तट के गरीब मोहल्लों में दाखिल हुआ — तो फुटबॉल फिर पहले जैसा खेल नहीं रह गया। वहाँ वह एक भाषा बन गया, एक प्रतिवाद बन गया, एक सपना बन गया।
1930 में पहला विश्व कप उरुग्वे ने जीता था। तब वह महज 18 लाख की आबादी वाला एक छोटा सा देश था (आज भी सिर्फ 33 लाख है)। उस समय यूरोप के बहुत से लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि दक्षिण अमेरिका की कोई टीम उनसे बेहतर फुटबॉल खेल सकती है। लेकिन उरुग्वे जीता। और फिर दोबारा जीता। और 1950 में माराकाना में ब्राजील को हराकर जो 'माराकानाज़ो' (Maracanazo) कर दिखाया, वह सिर्फ एक मैच नहीं था। माराकाना में उस दिन सिर्फ ब्राजील नहीं हारा था, बल्कि दो लाख आवाजों का उल्लास अचानक कब्र जैसी खामोशी में तब्दील हो गया था। और दक्षिण अमेरिका के उस छोटे से देश उरुग्वे ने दुनिया को याद दिलाया था कि फुटबॉल में भूगोल या आबादी हमेशा ताकत का पर्याय नहीं होती।वह बड़े देशों की बड़ी ताकत के खिलाफ छोटे देश के विद्रोह का दूसरा नाम था।
फिर आया ब्राजील। वह देश जिसे लंबे समय तक 'भविष्य का देश' कहा जाता था — एक ऐसा भविष्य, जो कभी आता ही नहीं। लेकिन फुटबॉल में वह भविष्य आ चुका था। पेले, डिडी, वावा, गारिंचा, जोरजिन्हो, तोस्ताव, रोनाल्डिन्हो…। और भी न जाने कितने महासितारे ब्राजील के आसमान पर दशकों तक कशीदाकारी की तरह सजते रहे — और उत्तरी गोलार्ध से दक्षिणी गोलार्ध तक उस इंद्रधनुष के रंग बिखरते रहे। वे सिर्फ जीते नहीं, उन्होंने दुनिया को खूबसूरती को एक नए नजरिए से देखना सिखाया। गेंद को पैरों में थामकर उन्होंने ही हरे मैदान पर लिखा था — फुटबॉल दुनिया का सबसे खूबसूरत खेल है। जिसे वे अपनी भाषा में कहते हैं — 'ओ जोगो बोनितो' (O Jogo Bonito)।
1970 के ब्राजील को देखकर ऐसा लगता था मानो ग्यारह इंसान नहीं, बल्कि एक पूरा महाद्वीप खेल रहा हो। सांबा, अफ्रीकी विरासत, पुर्तगाली उपनिवेशवाद के जख्म, बस्तियों की रचनात्मकता — सब कुछ मिलकर एक ऐसे फुटबॉल का जन्म हुआ, जो आज भी एक किंवदंती है।
फिर आया अर्जेंटीना और माराडोना। इससे पहले 1978 में मारियो केम्पेस की कप्तानी में अर्जेंटीना ने अपने घरेलू मैदान ब्यूनस आयर्स के 'एस्टाडियो मोन्युमेंटल' में विश्व कप का खिताब जीता था। वह विश्व कप बेहद विवादित था। मोन्युमेंटल में उस दिन कॉनफेटी (रंगीन कागजों के टुकड़े) उड़ रहे थे, स्टेडियम जीत के तराने गा रहा था; और वहीं से कुछ किलोमीटर दूर, एक दूसरा अर्जेंटीना खामोशी से अपने उन हजारों अपनों को ढूंढ रहा था, जो जुंटा शासन के कुख्यात 'एस्मा यातना केंद्र' (ESMA detention center) में गायब कर दिए गए थे। यही विरोधाभास 1978 के विश्व कप को फुटबॉल इतिहास के सबसे विवादित राजनीतिक विश्व कपों में से एक बनाता है।
लेकिन उन दिनों को पीछे छोड़कर जब माराडोना इंग्लैंड के खिलाफ गेंद लेकर आधे मैदान को पार करते हुए गोल करने बढ़े, तब वे सिर्फ कुछ डिफेंडरों को नहीं, बल्कि मानो इतिहास को भी छकाते हुए आगे बढ़ रहे थे। लैटिन अमेरिका के लोगों के लिए माराडोना कभी सिर्फ एक फुटबॉलर नहीं थे। वे उस असम्भव इंसान के प्रतीक थे, जो जानता है कि पूरी दुनिया उसके खिलाफ खड़ी है, फिर भी वह हार मानने को तैयार नहीं है। वे तीसरी दुनिया के सभी वंचितों और शोषितों के कप्तान थे। और अब हम एक और जीवित किंवदंती मेसी को देख रहे हैं — इस बार भी 2 मैचों में 5 गोल, अब तक। आगे और देखेंगे। उम्मीद है कि 19 जुलाई (व्याकरण के नियम से 20 जुलाई) की आधी रात को उनका बायां पैर एक बार फिर म्यान से निकली तलवार की तरह चमक उठेगा।
लेकिन फुटबॉल का इतिहास ब्राजील और अर्जेंटीना पर ही खत्म नहीं होता। पेरू के टेओफिलो क्यूबिलास एक ऐसे कलाकार थे, जिनका नाम आज बहुत कम लिया जाता है। कोलंबिया के वाल्डेरामा, एस्प्रिला, रिनकॉन ने फुटबॉल को मैदान पर गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ के उपन्यास की तरह लिखा — जहाँ हकीकत और जादू एक साथ चलते हैं। पैरागुवे ने कई बार साबित किया कि अनुशासन और जिद भी खूबसूरती का ही एक रूप हैं। चिली ने पाब्लो नेरुदा की कविताओं की तरह, कई पीढ़ियों में फुटबॉल की एक नई भाषा गढ़ी है। इक्वाडोर आज दुनिया की सबसे तेजी से उभरती हुई फुटबॉल ताकतों में से एक है। यहाँ तक कि कई सालों तक फुटबॉल के हाशिए पर रहने वाला वेनेजुएला भी अब पहले की तरह कमजोर नहीं रहा।
फिर भी आज एक सवाल लगातार गहरा रहा है। क्या लैटिन अमेरिका का फुटबॉल हार रहा है? शायद स्कोरबोर्ड पर नहीं। लेकिन सत्ता की इस लड़ाई में?
शायद हाँ।
क्योंकि आज फुटबॉल की ताकत मैदान पर नहीं, बाजार से तय होती है। दुनिया की बेहतरीन प्रतिभाएँ कहां खेलेंगी, किस क्लब में सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मिलेंगी, किसके पास सबसे उन्नत डेटा होगा, कौन दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कोचों को काम पर रखेगा — इन सब के जवाब पाउंड या यूरो में नपकर ज्यादातर समय यूरोप में ही जाकर खत्म होते हैं।
एक समय था जब लैटिन अमेरिका से यूरोप सोना जाता था; आज स्ट्राइकर जाते हैं।
एक समय था जब चाँदी जाती थी; आज मिडफील्डर जाते हैं।
एक समय था जब तांबा जाता था; आज गोलकीपर जाते हैं।
इतिहास बदला है, लेकिन उसका तर्क बहुत ज्यादा नहीं बदला। विश्व फुटबॉल की इस नई अर्थव्यवस्था ने लैटिन अमेरिका को एक अजीब स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। वह आज भी दुनिया के सबसे बड़े प्रतिभा उत्पादकों में से एक है, लेकिन वह अब उन प्रतिभाओं का मालिक नहीं है। कोई ब्राजीलियाई या इक्वाडोर का किशोर जैसे ही अठारह साल का होता है, यूरोप के क्लब उसे खरीद लेते हैं। जो महाद्वीप उन्हें जन्म देता है, वह महाद्वीप उनका पूरा निखार बहुत कम ही देख पाता है। इस मायने में, लैटिन अमेरिका का फुटबॉल आज उसकी अर्थव्यवस्था का ही एक प्रतिबिंब है।
उत्पादन यहाँ, और मुनाफा किसी दूसरे महाद्वीप में।
और ठीक इसी समय अफ्रीका दरवाजे पर दस्तक दे रहा है। मोरक्को ने दुनिया को दिखाया है कि अगर अनुशासन और आत्मविश्वास हो, तो इतिहास बदला जा सकता है। सेनेगल, घाना, आइवरी कोस्ट, केप वर्डे — ये सभी धीरे-धीरे पुरानी ताकतों के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। इनकी कहानी लैटिन अमेरिका के लिए जानी-पहचानी है, क्योंकि वे भी उपनिवेश के ही बच्चे हैं। वे भी जानते हैं कि भेदभाव क्या होता है। वे भी जानते हैं कि गरीबी की चरम सीमा से उठकर आने का मतलब क्या होता है!
एक समय था जब लैटिन अमेरिका यूरोप को चुनौती देता था, आज अफ्रीका भी उस चुनौती का भागीदार बन रहा है। 2026 का विश्व कप मानो इसी बदलाव का एक प्रतीकात्मक मंच है। यहां यूरोप की ताकत पहले की तरह ही मजबूत है।
लेकिन दुनिया अब सिर्फ यूरोप बनाम दक्षिण अमेरिका की कहानी नहीं रह गई है। यहाँ मोरक्को है, केप वर्डे है, घाना है। यहाँ ऐसे देश हैं जिनकी आबादी, अर्थव्यवस्था या बुनियादी ढांचे को देखकर उनकी सफलता का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। वे मानो विश्व फुटबॉल को याद दिला रहे हैं — इतिहास अभी खत्म नहीं हुआ है।
तो फिर लैटिन अमेरिका का संकट कहाँ है? संकट प्रतिभा का नहीं है, और न ही कल्पना का है। संकट ताकत का है। संकट आर्थिक निर्भरता का है। संकट एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का है, जहां दक्षिणी गोलार्ध प्रतिभा का उत्पादन करता है, और उत्तरी गोलार्ध उस प्रतिभा को संगठित और उसका व्यवसायीकरण करता है।
लेकिन सम्भावना भी यहीं है। क्योंकि लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत के पास कभी पैसा नहीं था। उसकी ताकत उसकी जीवंत संस्कृति थी। जो महाद्वीप सांबा बना सकता है, टैंगो बना सकता है, 'नुएवा कैंसियोन' (Nueva Canción) बना सकता है, जो गार्सिया मार्केज़, नेरुदा और बोर्हेस को पैदा कर सकता है — वह महाद्वीप फुटबॉल में भी एक नई भाषा गढ़ सकता है।
शायद आने वाले दिनों का सबसे बेहतरीन फुटबॉल सिर्फ यूरोपीय नहीं होगा, और न ही सिर्फ लैटिन अमेरिकी होगा। वह एक सम्मिश्रण होगा — यूरोप का विज्ञान, लैटिन अमेरिका की कल्पना, अफ्रीका की ताकत और एशिया का अनुशासन। इन सबसे मिलकर बनेगा एक नया फुटबॉल।
फुटबॉल एक ऐसा आईना है, जिसमें दुनिया खुद को देखती है। आज उस आईने में हम जो देख रहे हैं, वह सिर्फ एक खेल का बदलना भर नहीं है। हम देख रहे हैं सत्ता का हस्तांतरण, पूँजी का केंद्रीकरण, उपनिवेशवाद का लम्बा साया और इसी के साथ एक नए विद्रोह का जन्म। शायद लैटिन अमेरिका अब कभी अकेले विश्व फुटबॉल पर राज न करे, लेकिन वह आज भी वही महाद्वीप है जो हमें याद दिलाता है कि — फुटबॉल सिर्फ जीतने के लिए नहीं है, फुटबॉल सिर्फ आंकड़ों के लिए नहीं है, फुटबॉल सिर्फ बाजार के मुनाफे के लिए नहीं है। फुटबॉल आज भी विस्मय के लिए है।और जब तक किसी बस्ती का कोई बच्चा अपने पैरों में गेंद लेकर कुछ ऐसा करेगा जिसका अंदाजा कोई कंप्यूटर पहले से नहीं लगा सकता, तब तक लैटिन अमेरिका नहीं हारेगा। क्योंकि साम्राज्य बदलते हैं, बाजार बदलते हैं, विश्व कप की ट्रॉफी भी हाथ बदलती है, लेकिन सपनों का भूगोल इतनी आसानी से नहीं बदलता।
गैलरी में बैठे दर्शक अक्सर भूल जाते हैं कि पूँजी सिर्फ कारखाने नहीं बदलती, पूँजी इंसानों की कल्पना भी बदल देती है।
फुटबॉल में भी यही हुआ है। अब सब लोग 'मशीनी ढांचे' में एक ही तरह से दौड़ते हैं, एक ही तरह से प्लेस करते हैं, एक ही तरह से पोजीशन लेते हैं, एक ही तरह से हमला करते हैं। दुनिया जैसे धीरे-धीरे एक बड़ी अकादमी में तब्दील होती जा रही है, जहाँ विविधता के बजाय दक्षता सिखाई जाती है; जहाँ खूबसूरती के बजाय उत्पादकता और आनंद के बजाय सिर्फ नतीजे मायने रखते हैं।
फिर भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। एक बच्चा अब भी बस्ती की तंग गलियों में गेंद लेकर दौड़ता है। वह अब भी कोच की बात नहीं सुनता। वह अब भी ऐसा ड्रिबल करता है जिसकी कोई रणनीतिक व्याख्या नहीं की जा सकती। उन्हीं बच्चों की वजह से फुटबॉल आज भी जिंदा है। फुटबॉल का इतिहास आखिरकार विद्रोह का इतिहास है।
सत्ता ने हमेशा खेल को नियंत्रित करना चाहा है और फुटबॉल ने हमेशा कोई न कोई रास्ता निकाल लिया है।
शायद भविष्य यूरोप का हो, शायद ट्रॉफियां भी उन्हीं की हों। शायद एल्गोरिदम और सटीक हो जाए, शायद डेटा और भी अचूक हो जाए।
लेकिन फुटबॉल सिर्फ विजेताओं को याद नहीं रखता। फुटबॉल याद रखता है पेले और गारिंचा को, माराडोना को; उस नामुमकिन ड्रिबल को, उस गैर-जरूरी पास को; उस लम्हे को, जब एक गरीब लड़का गेंद से कहता है — 'आज हम नियम नहीं मानेंगे।' और जब तक दुनिया के किसी भी कोने में कोई बच्चा गेंद लेकर नियम तोड़ेगा, तब तक लैटिन अमेरिका का फुटबॉल नहीं हारेगा।
शायद वह ट्रॉफी हार जाए, लेकिन फुटबॉल की जान कभी नहीं हारेगा।
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— शमीक लाहिड़ी
25 जून,2026
( लेखक सीपीआई (एम) के पूर्व सांसद,'गणशक्ति' के संपादक और केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं)
अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय
जब सांबा के पैरों में जंजीरें पड़ती हैं- शमीक लाहिड़ी
अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय• प्रकाशित: 26 जून 2026 • 10 मिनट पठन
