वाम की आवाज़ (Vaam Ki Aawaz)
विकल्प की डिजिटल दुनिया
राज्य

अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना चाहती है संघ-भाजपा: मोहम्मद सलीम

राजीव कुमार पाण्डेय29 जून 20264 मिनट पठन19 बार पढ़ा गया

धार्मिक अल्पसंख्यकों को संकट में डालने के लिए आरएसएस की योजना के अनुसार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की संयुक्त गतिविधियों के क्रियान्वयन को समझाते हुए सलीम ने कहा कि देश के विभाजन का दंश झेलने के बावजूद पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक विभाजन नहीं था। लेकिन पंद्रह वर्षों में ममता बनर्जी के कुशासन के खिलाफ लोगों में जो गुस्सा पैदा हुआ था, भाजपा ने उसे तृणमूल विरोधी गुस्से के बजाय मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक गुस्से में बदल दिया।

अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना चाहती है संघ-भाजपा: मोहम्मद सलीम

अतीत में वाजपेयी-आडवाणी के दौर में जो भाजपा का गुप्त एजेंडा था, अब मोदी-शाह के शासन में वह खुलकर सामने आ गया है। भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकार छीनकर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर आरएसएस-भाजपा रखना चाहती हैं।। रविवार को 'आवाज' राज्य कमेटी की ओर से कोलकाता के हरेकृष्ण कोनार स्मृति भवन में आयोजित 'अल्पसंख्यकों के अधिकार और सुरक्षा का सवाल' विषय पर आयोजित सेमिनार में में सीपीआई(एम) के राज्य सचिव और 'आवाज' के सलाहकार मोहम्मद सलीम ने यह बात कही।

इजरायल के शासकों के साथ भारत के शासक दल की वैचारिक समानता का उल्लेख करते हुए सलीम ने कहा कि आर्थिक समस्याओं का समाधान किए बिना घुसपैठिए, रोहिंग्या, बांग्लादेशी जैसी बातें कहकर देश के भीतर ही एक हिस्से को दूसरे हिस्से के सामने 'दुश्मन' के रूप में पेश किया जा रहा है। जनसांख्यिकी परिवर्तन रोकने के नाम पर 'पुशबैक' (वापस भेजने) की धमकी दी जा रही है। बड़ी संख्या में पुशबैक करना बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं है, कुछ लोगों को ऐसा करने की कोशिश में ही सरकार के पसीने छूट रहे हैं । असली बात यह है कि आरएसएस भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकार छीनकर उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखना चाहता है। इजरायल ने जिस तरह फिलिस्तीनियों को अपनी ही जमीन पर बेगाना बना रखा है, उसी तरह आरएसएस-भाजपा भारत के अल्पसंख्यकों के नागरिक अधिकार छीनना चाहती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस हमले के खिलाफ प्रतिरोध की लड़ाई को किसी एक समुदाय की लड़ाई के रूप में न देखकर, सभी के नागरिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई के रूप में देखने की अपील सलीम ने की। उन्होंने कहा कि यह केवल चुनावी जंग से नहीं होगा। सभी को साथ लेकर राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष खड़ा करना होगा। सांप्रदायिक नफरत के प्रचार से वे हमारे मन के मानवीय पहलुओं को दानवीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हॉकरों को हटाने की समस्याओं को न देखकर, लोगों को हिंदू-मुस्लिम, बंगाली-गैर-बंगाली दिखाकर उन्हें क्रूरता की ओर धकेला जा रहा है। इसलिए इसके प्रतिरोध में सांस्कृतिक पहल की भी आवश्यकता है।

इस अवसर पर 'आवाज' के तत्वावधान में आयोजित सेमिनार में पूर्व सांसद व अधिवक्ता बिकास रंजन भट्टाचार्य, सीपीआई (एम) के विधायक मोस्ताफिजुर रहमान और 'आवाज' के राज्य सचिव रुहुल अमीन गाजी ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता संगठन के राज्य अध्यक्ष सैदुल हक ने की।

सभा में विकास भट्टाचार्य ने कहा कि एनआरसी (एसआईआर) में केवल मुस्लिम ही नहीं, बल्कि कई गरीब हिंदू लोग भी संकट में पड़े हैं। अब नागरिकता पर सवाल उठाकर उनके नागरिक अधिकार छीनने की कोशिश हुई, तो राजनीतिक लड़ाई के साथ-साथ हमारी कानूनी लड़ाई भी जारी रहेगी। मुस्तफीजुर रहमान ने कहा कि सभी गरीब लोगों के अधिकारों की रक्षा के संघर्ष को तेज करके ही अल्पसंख्यकों के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। फासीवादियों के खिलाफ लड़ाई सबको एकजुट करके ही लड़नी होगी।

पश्चिम बंगाल की सरकार में भाजपा के सत्तारूढ़ होने से बदले राजनीतिक घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए मोहम्मद सलीम ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस आरएसएस का एक राजनीतिक प्रोजेक्ट था। पंद्रह वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस ने सब कुछ तहस-नहस करके और लूट-खसोट मचाकर आरएसएस का रास्ता साफ किया और उनके प्रोजेक्ट को लागू किया। अब तृणमूल कांग्रेस गायब हो रही है, पार्टी के विधायक और सांसद पाला बदल रहे हैं। और भाजपा सरकार को तो असल में तृणमूल के ही पूर्व नेता चला रहे हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नजरों में नम्बर बढ़ाने के लिए वे और ज्यादा हिंदुत्व की आक्रामकता दिखा रहे हैं।

धार्मिक अल्पसंख्यकों को संकट में डालने के लिए आरएसएस की योजना के अनुसार तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की संयुक्त गतिविधियों के क्रियान्वयन को समझाते हुए सलीम ने कहा कि देश के विभाजन का दंश झेलने के बावजूद पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक विभाजन नहीं था। लेकिन पंद्रह वर्षों में ममता बनर्जी के कुशासन के खिलाफ लोगों में जो गुस्सा पैदा हुआ था, भाजपा ने उसे तृणमूल विरोधी गुस्से के बजाय मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक गुस्से में बदल दिया। एक तरफ ममता बनर्जी ने हिजाब पहनकर इमाम बरकती और सिद्दीकुल्लाह चौधरी को साथ लेकर मुसलमानों को धोखा दिया, तो दूसरी तरफ भाजपा ने मीडिया के जरिए शाहजहां और जहांगीर जैसे चेहरों को लुटेरी तृणमूल कांग्रेस के मुख्य चेहरे के रूप में प्रचारित किया। जबकि अनुब्रत मंडल, पार्थ चटर्जी और ज्योतिप्रिय मल्लिक जैसे नेता जो इन लुटेरों के असली आका थे, उन्हें नहीं दिखाया गया। इसका कारण भ्रष्टाचार को खत्म करना नहीं, बल्कि सांप्रदायिक विभाजन ही भाजपा का मुख्य लक्ष्य है।

.

.

साभार:बांग्ला दैनिक गणशक्ति

अपलोडर: राजीव कुमार पाण्डेय

विज्ञापन
और पढ़ें
सभी देखें →
राज्य

दानवीय नियम लाकर कर्मचारियों के अधिकार छीन रही राज्य सरकार

सोशल मीडिया पर समाज के सभी वर्गों के लोग भाजपा सरकार के इस दिशा-निर्देश को लेकर गुस्सा जताने लगे हैं। सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार, जबरन वसूली और सिंडिकेट को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' नीति के साथ काम शुरू करने का वादा करने वाली सरकार अचानक कर्मचारियों के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़ गई है?

श्रेया जायसवाल22 मई 2026

राज्य

'लेफ्ट फॉर फ्यूचर' - बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक मूल्यों का एक आधुनिक मॉडल - केशव भट्टड़

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक आकाश आज दो ध्रुवों — टीएमसी और भाजपा — के बीच आपसी वोट लाभ के लिए कुटिल योजना से फँसा दिया गया है। SIR , दबंगता, झूठ और पैसे के दम पर लोकतंत्र के अपहरण की पूरी तैयारी है। एक तरफ है राज्य सत्ता की मशीनरी, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की संस्कृति। दूसरी तरफ है केंद्र का SIR अटैक, सांप्रदायिक विभाजन, संस्थाओं पर नियंत्रण और विकास के नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति। दोनों ही दल पूंजीवादी-नवउदारवादी मॉडल पर टिके हुए हैं, जो आर्थिक असमानता को बढ़ावा देते हैं, पर्यावरण की उपेक्षा करते हैं और केवल मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। इन नीतियों के कारण किसान, मजदूर, छात्र, युवा और महिलाओं सहित आम नागरिकों की आवाज दब रही है, उनकी चिंताएं उपेक्षित हो रही हैं और उनके हितों को नुकसान पहुंच रहा है। लेकिन लेफ्ट फ्रंट न तो केवल टीएमसी का विकल्प है और न ही केवल भाजपा का। यह उससे कहीं ज्यादा हैं। लेफ्ट फ्रंट एक स्वतंत्र वैचारिक शक्ति है जो न सत्ता की लूट को बढ़ावा देती है और न ही धर्म के नाम पर समाज को बाँटती है। टीएमसी और भाजपा के भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिक कोलाहल से पूरी तरह अलग, लेफ्ट फ्रंट तीसरा रास्ता प्रस्तुत कर रहा है — लोकतंत्र, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित एक प्रगतिशील भविष्य का रास्ता, जिसका नाम है “लेफ्ट फॉर फ्यूचर”।

केशव कुमार भट्टड़13 अप्रैल 2026

राज्य

राष्ट्र तुम किसके हो ? - शमीक लाहिड़ी

प्रश्न पूछना ही नागरिक का धर्म है- भारत का लोकतंत्र आज एक संधिकाल से गुजर रहा है। यदि सूचनाओं को छिपाकर जनता के जनादेश को बदलने का प्रयास किया जाता है, तो यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ सबसे बड़ा विश्वासघात होगा।

श्रेया जायसवाल19 अप्रैल 2026