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पिताजी (सलिल चौधरी) ने पद्मश्री ठुकरा दिया था - अंतरा चौधरी

केशव कुमार भट्टड़21 मई 20269 मिनट पठन127 बार पढ़ा गया

पिता जी एक मशहूर संगीतकार हैं, यह समझने में मुझे वक्त लगा था। क्योंकि घर पर तो वह एक अलग ही इंसान थे। सिनेमाघरों में 'रजनीगंधा' या 'छोटी सी बात' जैसी फिल्में देखने जाने पर जब संगीत निर्देशक के रूप में परदे पर पिता जी का नाम उभरता, तब देखकर समझ आता कि मेरे पिता जी एक मशहूर व्यक्ति हैं। घर पर मेहमानों का आना-जाना देखकर भी मैं यह समझ पाती थी। घर पर रिहर्सल या महफिल में मन्ना काका (मन्ना डे), आशा दी (आशा भोंसले) आते थे। स्टूडियो जाकर देखा कि 'आज नय गुनगुन' की रिकॉर्डिंग में लता दी (लता मंगेशकर) आई हुई हैं। तब मुझे अहसास हुआ कि पिता जी कोई बड़ी हस्ती हैं।

पिताजी (सलिल चौधरी) ने पद्मश्री ठुकरा दिया था

- अंतरा चौधरी

क लंबा सूनापन है। मैं जानती हूँ कि यह खालीपन कभी नहीं भरेगा। इसलिए उनके संगीत का सहारा लेकर ही मैं जी रही हूँ। आज शाम को पिता जी के जन्मशताब्दी समारोह में मैं गाऊँगी। पिता जी की याद आएगी। पिछले कुछ दिनों से मैंने कलाकारों के साथरिहर्सल की। उनके गानों को लेकर लोगों की उत्सुकता और लगातार अभ्यास देखकर सचमुच लगता है कि पिता जी हमारे बीच ही हैं।

लोग आज भी मुझसे जानना चाहते हैं कि पिता जी संगीत कैसे बनाते थे। समंदर को तो छोटे से बर्तन में समेटना मुमकिन नहीं है। इसलिए आज के इस लेख में मैं पिता जी के साथ अपने रिश्ते के विभिन्न पहलुओं को पाठकों के सामने रखना चाहती हूँ। संगीतकार सलिल चौधरी और एक पिता के रूप में सलिल चौधरी— कुल मिलाकर वह इंसान बेहद सच्चे थे। कुछ दिन पहले मुझे पिता जी की एक पुरानी डायरी के पन्ने मिले। उन्होंने मेरे बारे में कितनी अच्छी-अच्छी बातें लिखी हैं। उसे पढ़कर ही मेरी आँखों में आँसू आ गए थे।

पिता जी मुझे 'मानू' कहकर पुकारते थे। और मैं हर वक्त पिता जी के साथ रहती थी। मैं तो मुंबई में बड़ी हुई हूँ। पिता जी को कभी 'बाबा' तो कभी 'डैड' कहती थी। पिता जी को इस बात का बुरा नहीं लगता था। वह कितने सहज इंसान थे, यह कुछ घटनाओं से साफ हो जाएगा। वह घर लौटते, सोफे पर बैठते ही कहते, "मानू, देख तो जरा कोई सफेद बाल दिख रहा है क्या? चिमटी ले आ।" कई बार वह दिन भर काम करके घर लौटते, पैरों में बहुत दर्द होता। कहते, "मेरे पैरों पर थोड़ी देर के लिए खड़ी हो जा तो।" उसके बाद मेरे हाथ पकड़कर पिता जी अपना संतुलन बनाते थे।

पिता जी एक मशहूर संगीतकार हैं, यह समझने में मुझे वक्त लगा था। क्योंकि घर पर तो वह एक अलग ही इंसान थे। सिनेमाघरों में 'रजनीगंधा' या 'छोटी सी बात' जैसी फिल्में देखने जाने पर जब संगीत निर्देशक के रूप में परदे पर पिता जी का नाम उभरता, तब देखकर समझ आता कि मेरे पिता जी एक मशहूर व्यक्ति हैं। घर पर मेहमानों का आना-जाना देखकर भी मैं यह समझ पाती थी। घर पर रिहर्सल या महफिल में मन्ना काका (मन्ना डे), आशा दी (आशा भोंसले) आते थे। स्टूडियो जाकर देखा कि 'आज नय गुनगुन' की रिकॉर्डिंग में लता दी (लता मंगेशकर) आई हुई हैं। तब मुझे अहसास हुआ कि पिता जी कोई बड़ी हस्ती हैं।

पिता जी काम के मामले में बेहद मेहनती थे। दिन भर शायद घर पर धुन बना रहे हैं, पियानो छोड़कर उठने का समय नहीं है। मैंने देखा है कि माँ पिता जी को वहीं सूप पिला देती थीं। जीवन के आखिरी दौर में पिता जी बॉम्बे के 'कुरुक्षेत्र' और 'दरार' जैसे कई धारावाहिकों के लिए संगीत तैयार कर रहे थे। उनके साथ मैं प्रोग्रामिंग करती थी। बजट बहुत कम था। लेकिन इसकी वजह से पिता जी काम को कम समय देंगे, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा। मैं देखती थी कि वह घंटों-घंटों काम किए जा रहे हैं।

संगीत के प्रति पिता जी की जितनी जिम्मेदारी थी, परिवार के प्रति भी ठीक वैसी ही जिम्मेदारी थी। पिता जी गणित और भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) में बहुत अच्छे थे। वह मुझे पढ़ाते थे। मैंने कभी उन्हें जरा सा भी डाँटते नहीं देखा। लेकिन रिकॉर्डिंग फ्लोर पर अगर संगीतकार कोई धुन नहीं बजा पाते और बार-बार टेक लेना पड़ता, तब पिता जी थोड़े निराश हो जाते थे। कभी ऐसा होता कि मैं गाना नहीं गा पा रही हूँ, तो पिता जी गुस्सा होने के बजाय धीमे से कहते, "मानू, मुँह को ऐसे सिकोड़कर गा रही हो कि कोई शब्द समझ ही नहीं आ रहा। थोड़ा खुलकर गाओ।" पिता जी हमेशा मुझे सपोर्ट करते थे। वह चाहते थे कि मैं संगीत की रचना करूँ। एक घटना याद आ रही है।

साल 1976 में मैंने 'सिस्टर' फिल्म में कोरस में गाना गाया था। अगले साल पिता जी 'मीनू' फिल्म पर काम कर रहे थे। तब मेरी उम्र 7 साल थी। पिता जी को एक बाल कलाकार (चाइल्ड आर्टिस्ट) की आवाज की तलाश थी। उन दिनों लता मंगेशकर या आशा भोंसले खुद ही बच्चों की आवाज में गा दिया करती थीं। तब माँ ने पिता जी को मुझे मौका देने का सुझाव दिया। पिता जी मान गए और इस तरह मेरे संगीत के सफर की शुरुआत हुई। मुझे याद है, मुंबई के महबूब स्टूडियो में मैंने 'ओ काली रे' गाने की रिकॉर्डिंग की थी। बचपन में मुझे गुड़ियों से खेलना पसंद था, इसलिए पिता जी ने मुझे गुड़ियों को लेकर भी कई गाने बनाकर दिए थे। 'मीनू' के गाने लोकप्रिय होने के बाद एक दिन घर पर वी. बलसारा आए। उन्होंने मुझसे बच्चों के लिए पूजा (दुर्गा पूजा) के गाने बनवाने का सुझाव दिया। इसके नतीजे में एक-एक करके 'बुलबुल पाखी', 'पूजोर गंधो एशेछे' जैसे गाने बने।

पिता जी पर मैंने कभी उस तरह से गुस्सा नहीं किया। लेकिन बॉम्बे से मुझे और संचारी को बांग्ला सीखने के लिए पिता जी ने कोलकाता के गोखले स्कूल भेज दिया। तब मैं हॉस्टल में रहती थी। माता-पिता का साथ नहीं मिल पाने के कारण बहुत गुस्सा आता था। लेकिन मैं यह बात पिता जी से नहीं कहती थी, माँ से कहती थी। बड़ी होने पर पिता जी मेरे दोस्त जैसे बन गए, तब मैंने उन्हें यह बात बताई थी। बाद में मुझे समझ आया कि पिता जी ने जो किया था, वह मेरी भलाई के लिए ही था। क्योंकि माता-पिता को बहुत सफर करना पड़ता था, वहीं हॉस्टल में रहने से मेरी पढ़ाई का कोई नुकसान नहीं हुआ। कृष्णचंद्र बंद्योपाध्याय से मेरा शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण या सैम इंजीनियर से पियानो सीखना— यह सब कोलकाता में ही तो हुआ।

संगीत सुनने और रियाज करने पर पिता जी बहुत जोर देते थे। ऐसा भी हुआ है कि मैं गुरु जी से गाना सीख रही हूँ और पिता जी आकर बैठ गए। उन्होंने कहा, "मैं भी यह बंदिश सीखूँगा, सीखने का कोई अंत नहीं है।" फिर उसी बंदिश से उन्होंने मेरे लिए एक नया गाना बना दिया। तब मैं काफी बड़ी हो चुकी थी। हर दिन शाम को मैं नियम से रिकॉर्ड पर पिता जी के साथ वेस्टर्न क्लासिकल (पाश्चात्य शास्त्रीय) संगीत सुनती थी। बाख, बीथोवेन, मोजार्ट, स्ट्राविंस्की— कुछ भी नहीं छूटता था। और पिता जी कहते थे, "मानू, बस ध्यान दो कि वे इस पीस (संगीत के टुकड़े) की शुरुआत कैसे कर रहे हैं। इसके संगीत संयोजन (अरेन्जमेंट) को महसूस करने की कोशिश करो। और सोचो, जो लोग इसे नहीं सुन रहे हैं, वे कितने वंचित रह जा रहे हैं।" भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति भी पिता जी का अगाध सम्मान था। फैयाज खान साहब और करीम खान उनके पसंदीदा कलाकारों में से थे।

अस्सी के दशक में पिता जी मुंबई छोड़कर कोलकाता आ गए। क्योंकि तब 'डिस्को' संगीत का दौर आ गया था, जो पिता जी को पसंद नहीं आता था। उन्होंने बेहाला में 'साउंड एंड साउंड' नाम से एक आधुनिक स्टूडियो खोला। लेकिन वह बिजनेस अच्छा नहीं चला। मैंने पिता जी को डिप्रेशन (अवसाद) से जूझते हुए भी देखा है। कोलकाता में कोई उन्हें काम का ऑफर नहीं देता था। मैंने पिता जी को डायरी-पेन लेकर चुपचाप बैठे हुए देखा है। लिख नहीं पा रहे हैं, बस गहराई से सोचे जा रहे हैं। दोस्तों का आना-जाना कम हो गया था। तब शायद पिता जी का साथ देने के लिए मैं या माँ उनसे बातें करती थीं। एक कलाकार किस तरह हमेशा अकेलेपन का शिकार होता है, यह मैंने पिता जी को देखकर समझा था। इसके अलावा, पिता जी अपने समय से आगे के कलाकार थे। काम के सिलसिले में आखिर में पिता जी को फिर से मुंबई जाना पड़ा। 1990 में उन्होंने 'आश्रिता' फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक दिया। मलयालम इंडस्ट्री से भी एक के बाद एक काम मिलने लगे। लेकिन काम न होने पर भी मैंने पिता जी को कभी टूटते नहीं देखा। वह हमेशा खुद को नए सिरे से गढ़ते थे। डायरी के पन्नों में भी वह इस कोशिश की बात लिख गए हैं। हमसे कहते थे, "देखो, मुझे शायद अभी कोई समझ नहीं पा रहा है। लेकिन मेरे जाने के 50 साल बाद भी तुम देखना, मुझे लेकर चर्चा होगी।"

पिता जी को पुरस्कार मिलना पसंद था। उन्होंने एक जगह लिखा भी था, "अवॉर्ड पाना किसे अच्छा नहीं लगता!" उन्हें सिर्फ एक फिल्मफेयर मिला था। लेकिन 1992 में पिता जी ने 'पद्मश्री' ठुकरा दिया था, क्योंकि पूरे जीवन के अंत में भारत सरकार उन्हें पद्मश्री देना चाहती थी, जबकि उनके समकालीन कलाकारों को तब तक 'पद्मभूषण' या 'भारत रत्न' मिल चुका था। पिता जी को बहुत दुख हुआ था। समकालीन कलाकारों की आलोचना करते मैंने पिता जी को कभी नहीं सुना। वह संगीत में बुद्धिमत्ता की छाप छोड़ने पर विश्वास रखते थे। आर.डी. बर्मन के बारे में कहते थे, "पंचम रिदम का जादूगर है।" वहीं 'तेजाब' फिल्म का 'एक दो तीन' गाना लोग क्यों सुन रहे हैं, इसका विश्लेषण पिता जी ने अपने तरीके से किया था। 'रोजा' फिल्म के गाने सुनकर ए.आर. रहमान के बारे में कहा था, "गाने सुने हैं। अच्छे बने हैं।" लेकिन फूहड़ गानों के बोल पिता जी को पसंद नहीं थे। आज संगीत जगत के हालात देखकर शायद पिता जी को थोड़ा दुख ही होता।

नब्बे के दशक में अपनी लिखी कहानी पर पिता जी ने दूरदर्शन के लिए 'यादगार' नाम से एक धारावाहिक बनाने का फैसला किया। अभिनय के लिए कमलजीत और देवश्री राय को चुना। लेकिन पिता जी बीमार हो गए। अस्पताल में पिता जी को देखने मृणाल काका (मृणाल सेन) और ऋषि काका (ऋषिकेश मुखर्जी) आए थे। मुझे याद है अमिताभ बच्चन और अनूप जलोटा ने मुंबई से फोन करके पिता जी का हालचाल लिया था। उसके बाद तो एक दिन पिता जी चले गए! मैं आज भी पिता जी के स्पर्श को मिस करती हूँ। रियाज के बीच पीछे से मेरे सिर पर पिता जी का हाथ रखना आज भी याद आता है। उस दिन भी 'विश्वपिता तुमि हे प्रभु' गाते हुए आँखों में आँसू आ गए।

संगीत के आगे पिता जी ने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने कामयाबी के शिखर को छुआ। रास्ते में ठोकरें भी खाईं, फिर खुद को नए सिरे से तोड़ा और गढ़ा। मुझे तो लगता है कि ' जाक जा गेछे ता जाक- (जो चला गया, सो चला गया) गाने की तरह ही पिता जी का जीवन दर्शन था। वह हमेशा पॉजिटिव रहे। पिता जी मानते थे कि हर इंसान एक खास मकसद के साथ पैदा होता है। उनकी बेटी बनकर पैदा होने पर मुझे गर्व है।

— सलिल चौधरी की बेटी प्रसिद्ध गायिका अंतरा चौधरी (आनंदबाजार पत्रिका)

अपलोडर: केशव कुमार भट्टड़

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