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जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़

केशव कुमार भट्टड़•27 जुलाई 20267 मिनट पठन212 बार पढ़ा गया

"दबाओगे बर्बरता से जितनी आवाजें, गूँजेगी उतनी ही दूर तक इंकलाब की पुकार।"। नीट (NEET) परीक्षा धांधली और शिक्षा के बाज़ारीकरण के खिलाफ जंतर-मंतर पर चल रहा छात्रों-युवाओं का अहिंसक आंदोलन राज्य सत्ता के सीधे निशाने पर आ गया। सरकार ने फर्जी साजिशें रचकर, संचार बंद कर और बेलगाम पुलिसिया बल प्रयोग से बतर्ज 'जलियाँवाला बाग़' हजारों प्रदर्शनकारी युवाओं को घेर कर बर्बरता से पीटा और आंदोलन को दबंगता से दबाने की कोशिश की, गोदी मीडिया की चुप्पी के बीच स्वतंत्र पत्रकारों पर सत्ता प्रायोजित हमले हुए, और प्रतिक्रिया में 'जंतर-मंतर जेन-जी दमन' से आक्रोशित छात्रों का यह आंदोलन देशभर में फैल गया। तब ब्रिटिश राज के दौरान जलियाँवाला बाग़ में अंधाधुंध गोलियाँ दागी गई थी, अब बीजेपी राज में जंतर-मंतर जेन-जी दमन के दौरान कील लगी लाठियाँ, आँसू गैस, वाटर कैनन, शॉक बेटन, पेलेट गन के साथ-साथ लात-बूटों,थप्पडें और भद्दी गालियाँ दागी गई हैं। तब देश गुलाम था, अब देश आजाद है, दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। तब भी भारत डोला था, अब भी भारत डोला है। तब तारीख थी 13 अप्रैल 1919, अब तारीख थी 20 जुलाई 2026। और शाम होते-होते छात्रों-युवाओं ने जंतर-मंतर पर वापस कब्ज़ा कर यह साबित कर दिया कि कॉर्पोरेटऔर सत्ता गठजोड़ की बर्बरता से विचारों और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता। बुरी तरह पुलिस और अर्धसैनिक बलों से मार खाकर भी बंद मुट्ठी तनकर उठी हुई थी। युवा भारत के इस जोश-जुनून-जज्बे को सलाम।

जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़


"तब ईस्ट इंडिया कंपनी गई, अब वेस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ उठी है क्रांति की मशाल!"
जंतर-मंतर पर छात्र दमन: कॉरपोरेट-राज्य का बर्बर चेहरा: एक विश्लेषण

~ केशव भट्टड़

भारत का लोकतंत्र आज अपनी सबसे गंभीर ऐतिहासिक त्रासदी से गुज़र रहा है। एक तरफ जहाँ शासक अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर "सबसे बड़े लोकतंत्र" का ढोंग रचता है, वहीं दूसरी ओर देश की सड़कों पर अपने अधिकारों, पारदर्शी शिक्षा और गरिमापूर्ण भविष्य की माँग कर रहे युवाओं पर सिस्टम की नग्न और बर्बर हिंसा उतारी जा रही है। जंतर-मंतर पर घटित घटनाक्रम केवल पुलिसिया ज्यादती का मामला नहीं है, बल्कि यह कॉर्पोरेट-फ़ासीवादी सत्ता द्वारा अपने ही नागरिकों के विरुद्ध छेड़ा गया एक संगठित युद्ध है।


साता की साजिश और आंदोलन को बदनाम करने का 'एजेंट प्रोवोकेटर' मॉडल

20 जुलाई की तड़के 4:40 बजे जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर क्षतिग्रस्त वाहन, ईंट-पत्थरों से भरे ट्रक और संदिग्ध परिस्थितियों का मिलना शासक की पुरानी और आजमाई हुई चाल है।

सत्ता का षड़यंत्र : ऐतिहासिक रूप से जब भी कोई जन-आंदोलन अहिंसक, अनुशासित और वैचारिक रूप से मजबूत होकर उभरता है, अलोकतांत्रिक चरित्र की सत्ता षड़यंत्र का सहारा लेकर उसमें सेंध लगाने के लिए 'एजेंट प्रोवोकेटर्स' (Agent Provocateurs) का सहारा लेती है और संदिग्ध परिस्थितियों का निर्माण करती है।

सुरक्षा का जानबूझकर पतन: संसद मार्ग जैसी अत्यधिक सुरक्षित लालफीताशाही पट्टी पर पुलिस की मिलीभगत के बिना क्षतिग्रस्त वाहन, ईंट-पत्थरों से भरे ट्रक का पहुँचना असंभव है। मेटल डिटेक्टर्स और सुरक्षा चेकिंग का रातों-रात हटा लिया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि सिस्टम स्वयं हिंसा का माहौल तैयार कर आंदोलन की नैतिक वैधता को नष्ट करना चाहता था, ताकि अगली सुबह होने वाले विशाल छात्र-मार्च पर बर्बर दमन का औचित्य साबित किया जा सके।

नवउदारवादी शिक्षा नीति और छात्रों का शोषण

इस जन-आंदोलन का मूल कारण शिक्षा का बढ़ता बाज़ारीकरण और नवउदारवादी नीतियाँ हैं।

शिक्षा का बाज़ारीकरण: नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय परीक्षाओं में लगातार हो रही धांधली, पर्चा लीक और सीटों का घोटाला, ऑन लाइन कॉपी मार्किंग में गड़बड़ियाँ और एग्जाम कॉपी का बदल जाना, मिसिंग हो जाना कोई संयोग नहीं है। यह शिक्षा प्रणाली को निजी पूँजीपतियों के हाथों बेचने और आम गरीब-मध्यम वर्गीय युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बेदखल करने की सोची-समझी नीति का हिस्सा है।

जन-आकांक्षाओं की अनदेखी: 20 जून से शुरू हुआ यह आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे की माँग नहीं था, बल्कि यह सत्ता-तंत्र द्वारा युवाओं के भविष्य की बोली लगाने के खिलाफ एक स्वाभाविक आक्रोश था। सोनम वांगचुक और नेहा बोरा जैसे युवा नागरिकों की , सामाजिक कार्यकर्ताओं की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल को 23 दिनों तक अनदेखा करना यह दर्शाता है कि इस सत्ता को युवाओं और छात्र वर्ग के जीवन या स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं है।

सिस्टम का दमनकारी पुलिसिया ढाँचा

17 जुलाई को दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा का असामयिक स्थानांतरण और इंटेलिजेंस ब्यूरो के विशेष निदेशक अनुराग कुमार की नियुक्ति राज्य के नौकरशाही और सैन्यीकरण को दर्शाती है। सीपीआई (एम) के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने इसका तीव्र प्रतिवाद करते हुए इस बदलाव पर प्रश्न उठाया।

शांतिपूर्ण प्रतिरोध का आपराधिककरण: जब कोई पुलिस अधिकारी संविधान और कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण जन-आंदोलन पर सीधे दमन से हिचकिचाता है, तो सत्ता तंत्र तुरंत अधिक वफादार और कठोर खुफिया-अधिकारियों को कमान सौंप देता है।

सोनम वांगचुक को उठाना : 18 जुलाई की सुबह 6:30 बजे असहाय अवस्था में सोनम वांगचुक को मंच से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में नजरबंद करना लोकतांत्रिक अधिकारों का सीधा हनन था। यह सत्ता द्वारा जन-नेताओं को जनता से अलग-थलग करने की सर्वसत्तावादी प्रवृत्ति को उजागर करता है। 'उठाना' शब्द का प्रयोग मैनस्ट्रीम मीडिया ने किया। इस शब्द का प्रयोग सारी पोल खोल दे रहा है।

20 जुलाई: सत्ता का नग्न आतंक

"युवाओं के दर्द का हिसाब, जल्द लिखेगा नया इतिहास!"

20 जुलाई को दिल्ली की सड़कों पर जो हुआ, वह आधुनिक समय में सत्ता-प्रायोजित आतंकवाद का क्लासिक उदाहरण है।

संचार और आवाजाही पर नाकेबंदी: धारा 163 (पूर्व में 144) का दुरुपयोग, 10-10 फीट ऊँचे लोहे के बैरिकेड्स को वेल्ड करना, 150 से अधिक टावरों पर इंटरनेट ब्लैकआउट और संचार जैमर्स का उपयोग—यह दर्शाता है कि सत्ता तंत्र जनता की आवाज़ और सूचना के प्रसार से कितना भयभीत है।

सार्वजनिक परिवहन को बनाया दमन का हथियार: जनपथ, राजीव चौक, पटेल चौक जैसे 5 , जिसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 17 कर दिया गया, प्रमुख मेट्रो स्टेशनों को बंद करके आम जनता और छात्रों को उनके संवैधानिक अधिकारों के प्रयोग से वंचित किया गया।

बर्बर लाठीचार्ज और आंसू गैस: मंडी हाउस, संसद मार्ग और आईटीओ पर हजारों निहत्थे छात्रों, महिलाओं और बुजुर्गों पर अंधाधुंध आंसू गैस के गोले छोड़ना और लाठियाँ भांजना औपनिवेशिक काल की याद दिलाता है। इसके साथ ही वाटर कैनन, शॉक बेटन, कील लगी लाठियाँ, भारी बूटों से किक, थप्पड़, भद्दी गलियाँ - सत्ता का क्रूरतम चेहरा - बहुत बुरा था।

पुलिस का पहचान छुपाना और गुंडागर्दी: पुलिसकर्मियों द्वारा वर्दी से नेमप्लेट हटाना, गाड़ियों की नंबर प्लेट छुपाना, चेहरे पर रुमाल बांधना और सादे कपड़ों में दंगाई तत्वों को छात्रों पर हमला करने के लिए ढील देना यह साबित करता है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ संगठित गिरोह की तरह, आपराधिक मानसिकता से काम कर रही थीं।

स्वास्थ्य सेवा पर हमला: घायल छात्रों की मदद करने आए डॉक्टरों तक को पीटना और गिरफ्तार करना यह दर्शाता है कि सत्ता अमानवीयता की अंतिम सीमा तक गिर चुकी है।

कॉरपोरेट मीडिया की चुप्पी बनाम वैकल्पिक जन-पत्रकारिता
जब शिक्षा का व्यापार होगा, तब सड़कों पर क्रांति का नया आगाज़ होगा।

गोदी मीडिया का चरित्र: इस पूरे दमन के दौरान मुख्यधारा का कॉरपोरेट-नियंत्रित मीडिया (मैनस्ट्रीम मीडिया) या तो पूरी तरह खामोश रहा या सत्ता के भोंपू की तरह झूठ फैलाता रहा। दलाल मीडिया का काम ही जन-संघर्षों को दबाना और सत्ता के नैरेटिव को स्थापित करना है।

इंडिपेंडेंट मीडिया पर हमला: ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों, यूट्यूबर्स (जैसे राजीव रंजन,अभिनव पांडेय, सार्थक गोस्वामी, प्रज्ञा मिश्र, रमीत वर्मा, मेधा यादव, संदेश भाटिया, तनुश्री पाबड़े, श्याम मीरा सिंह, काव्या कर्नाटक, शमदीश भाटिया) पर पुलिस और सादे कपड़ों में गुंडों द्वारा किए गए जानलेवा हमले यह साबित करते हैं कि यह रेजीम सत्य की एक झलक से भी थर-थर कांपती है।


राजनीति का ढोंग और दिखावटी वार्ता

कागज़ के पन्नों पर लोकतंत्र, सड़कों पर उतरा है निरंकुश शासन का तंत्र।

10:40 बजे सीजेपी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत का जो नाटक रचा गया—पहले डीएम , फिर सचिव, फिर राज्य मंत्री और अंत में जे.पी. नड्डा के साथ केवल 10 मिनट की औपचारिकता—यह जन-आंदोलन की दिशा को भटकाने और उसका नेतृत्व विहीन करने की एक क्लासिक 'डाइवर्ट और डिले' (Divert & Delay) रणनीति थी। इसका मुख्य उद्देश्य आंदोलन के मुख्य प्रवक्ताओं को वार्ता के नाम पर व्यस्त रखकर सड़कों पर छात्रों को पुलिसिया बर्बरता का शिकार बनाना था, अहंकारी सत्ता अपनी ताकत दिखाने पर आमादा थी।

छात्र-युवा एकजुटता: 'वेस्ट इंडिया कंपनी' के खिलाफ नई क्रांति
मंच तोड़ा, लाठियाँ चलाईं; पर वे छात्रों के बुलंद हौसलों को न तोड़ सके।

इस बर्बर दमन के बावजूद, जो बात सबसे महत्वपूर्ण बनकर उभरी, वह थी जनता का अटूट जुझारूपन और एकता ।

राष्ट्रीय एकजुटता: यह आंदोलन दिल्ली की सीमाओं में कैद नहीं रहा। लखनऊ, इलाहाबाद, अहमदाबाद, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु, गोवा और अरुणाचल प्रदेश आदि तक छात्रों का सड़कों पर उतरना इस बात का प्रमाण है कि देश का युवा अब इस शोषक व्यवस्था के खिलाफ एकजुट हो रहा है।

जंतर-मंतर पर पुनः कब्ज़ा : दोपहर 3:30 बजे जिस जंतर-मंतर को पुलिस ने बलपूर्वक खाली कराया था, शाम होते-होते छात्रों का वहाँ वापस लौटना और टूटे हुए मंच को पुनः खड़ा करना यह साबित करता है कि "दमन से विचार और क्रांति को दबाया नहीं जा सकता।"

तानाशाहों का इतिहास गवाह है, जन-आक्रोश के आगे हर हुकूमत झुकी है।

यह संघर्ष केवल एक परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष 'ईस्ट इंडिया कंपनी' के पुराने शोषक मॉडल को नए रूप में लागू कर रही 'वेस्ट इंडिया कंपनी' (कॉर्पोरेट-सत्ता गठजोड़) के खिलाफ है। इतिहास साक्षी है कि जब-जब निरंकुश शासकों ने जनता के सब्र का इम्तिहान लिया है और हिंसा का सहारा लिया है, तब-तब जन-क्रांति की आग में सत्ता के गलियारे भस्म हुए हैं। छात्रों और युवाओं का यह उफ़ान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इतिहास के पहिये को पीछे नहीं घुमाया जा सकता, और इस दमनकारी पूँजीवादी-फ़ासीवादी सत्ता का अंत निकट है।

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जंतर-मंतर जेन-जी दमन : कॉरपोरेट-सत्ता गठजोड़ का बर्बर चेहरा। ~ केशव भट्टड़

प्रकाशित: 27 जुलाई 2026 • 7 मिनट पठन

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कूचबिहार की माटी से उठकर बंगाल के लोकगीतों को वैश्विक पहचान दिलाने वाले 'सुरेर पाखी' ('सुरों का पंछी') अब्बासुद्दीन अहमद की प्रेरणादायी जीवन गाथा उस प्रगतिशील और गैर-सांप्रदायिक राजनीति व संस्कृति को रेखांकित करती है जो संस्कृति - धर्म, संप्रदाय और रूढ़िवादिता की सीमाओं से परे - मानवीय एकता को स्थापित करती है। अब्बासुद्दीन और काज़ी नज़रुल इस्लाम का कलात्मक सहयोग और तत्कालीन कूचबिहार रियासत (अभी पश्चिम बंगाल राज्य का एक जिला ) का साझा ग्रामीण परिवेश इस बात का प्रमाण रहा कि लोक-संस्कृति हमेशा से सांप्रदायिक सद्भाव की मजबूत धुरी रही है। आलेख रूढ़िवादी ताकतों द्वारा धर्म की दुहाई देकर कला पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का पुरजोर वैचारिक विरोध करता है। साथ ही, यह हाशिए के किसानों, चरवाहों, गाड़ीवानों, महावतों, नाविकों, मछुआरों, सामूहिक मजदूरी करने वालों और साधारण जनमानस की संस्कृति को मुख्यधारा में लाकर एक समावेशी (इन्क्लूसिव) और समतामूलक (इक्वल) समाज के निर्माण का संदेश देता है।

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नीट पेपर लीक कांड : केंद्र सरकार की गंभीरता पर '?' है। - केशव भट्टड़

किसी भी बड़े घोटाले में अपराधी भले ही व्यक्ति हों, व्यक्तियों का समूह हो, लेकिन "छात्रों का भरोसा टूटना" सरकार की बड़ी असफलता है। सरकार केवल जांच तक सीमित न रहकर, पूरी चयन और सुरक्षा प्रक्रिया का 'रूट कैनाल ट्रीटमेंट' (जड़ से सफाई) करे। यह करना जरूरी है। किसी भी परीक्षा पेपर का लीक होना मतलब सरकारी सुरक्षा को भेद कर परीक्षा पेपर की बिक्री करने वाले गिरोह उसे सही समय पर उड़ा लेते हैं और मुंह-मांगी कीमत पर आगे बेच देते हैं। नीट पेपर का लीक होना सरकार के काम-काज की गंभीरता पर सीधा सवालिया निशान (?) है।

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

विश्लेषण

सूचना का नियंत्रित प्रवाह और भारतीय लोकतंत्र का डिजिटल संकट ~केशव भट्टड़

आधुनिक भारतीय राजनीति में सत्ता द्वारा सूचना को नियंत्रित कर भ्रम का माहौल बनाने और उसके कारण लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ते दुष्प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक ब्योरा है यह विमर्श । यह प्रायोजित इकोसिस्टम देश के धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताने-बाने को जहरीला बनाकर बुनियादी सवालों (स्वास्थ्य, शिक्षा,रोजगार, पर्यावरण आदि) को हाशिए पर धकेल रहा है। इससे निपटने के लिए नागरिकों के भीतर "डिजिटल एवं मीडिया साक्षरता" के साथ-साथ कड़े कानूनी नियमों का होना बहुत जरूरी है।

जन-आंदोलनों और असहमति का दमन: जब भी छात्र, किसान या नागरिक अपनी जायज़ मांगों के लिए आवाज़ उठाते हैं, तो सत्ता दल का संगठित डिजिटल तंत्र (आईटी सेल्स) उनके मूल मुद्दों पर बहस करने के बजाय उन्हें "टूलकिट", "राजनीतिक मोहरा" या "राष्ट्र-विरोधी" ठहराकर सत्ता हित में आंदोलन की साख बिगाड़ने, उसे संदेहास्पद बनाने और असहमति का गला घोंटने का काम करता है।

भ्रामक तकनीकों का इस्तेमाल: जनमानस को गुमराह करने के लिए कांट-छांट कर बनाए गए क्लिप्ड वीडियो (cropped videos), पुरानी या असंबंधित तस्वीरें और लक्षित चरित्र-हनन (targeted trolling) का सहारा लिया जाता है।

एआई और डीपफेक का नया संकट: तकनीक के आगे बढ़ने के साथ वॉयस क्लोनिंग, एआई-जनरेटेड फर्जी तस्वीरें और डीपफेक वीडियो का इस्तेमाल करके 'पूर्णतः गढ़े गए सच' (synthesized reality) का निर्माण किया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पक्ष महिलाओं, पत्रकारों, छात्रों, विपक्षी नेताओं और असहमत नागरिकों का चरित्र-हनन तथा "लायर्स डिविडेंड" (दोषियों द्वारा अपने वास्तविक अपराधों को भी एआई/डीपफेक बताकर मुकर जाना) है।

मीडिया और सत्ता का गठजोड़: डिजिटल वॉर-रूम्स में तैयार भ्रामक हैशटैग्स और प्रायोजित मुद्दों को मुख्यधारा का मीडिया (गोदी मीडिया) बिना किसी फैक्ट-चेक के अपने प्राइम-टाइम शो में जगह देता है, जिसे संस्थागत मौन समर्थन भी दे दिया जाता है।

लोकतंत्र केवल संविधान के पन्नों में जीवित नहीं रहता, वह नागरिकों की जागरूक चेतना में सांस लेता है। जब सत्ता या राजनीतिक दल ब्रॉडकास्टिंग और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी एवं एआई का इस्तेमाल असहमति को दबाने, चरित्र-हनन करने और जनता को गुमराह करने के लिए कर रहे हों, तब 'मीडिया साक्षरता' ही वह लोकतांत्रिक हथियार है जो नागरिकों को अंधभक्त या मोहरा बनने से बचा सकती है। सच को पहचानना और झूठ के कारोबार को खारिज करना ही आज के दौर में सबसे बड़ी देशभक्ति और लोकतांत्रिक कर्तव्य है। इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है जो तकनीकी पारदर्शिता (जैसे डिजिटल वॉटरमार्किंग), संस्थागत स्वतंत्रता और कड़ी कानूनी जवाबदेही का एक संतुलित ढांचा प्रदान करे। यह तकनीक के विकास को बिना रोके, उसके 'दुष्प्रचार और दमनकारी उपयोग पर पूर्ण विराम' लगाने में सक्षम हो। कानून का उपयोग सत्ता या उसके दल द्वारा जायज असहमति या पत्रकारिता को दबाने के लिए न हो, इसके लिए विशेष प्रावधान भी हो।


केशव कुमार भट्टड़ • 25 जुलाई 2026

विश्लेषण

भारत के बारे में लेनिन ~ बुद्धदेव भट्टाचार्य

"गुलाम भारत की मुक्ति और एशियाई जन-एकता को दिशा देने वाला लेनिन का क्रांतिकारी दृष्टिकोण।" - बुद्धदेव भट्टाचार्य द्वारा बांग्ला में प्रस्तुत यह मूल-आलेख एक तारीखवार ऐतिहासिक-वैचारिक अध्ययन है, जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन एवं औपनिवेशिक मुक्ति-संग्राम के प्रति लेनिन की गहरी विश्लेषणात्मक दृष्टि को रेखांकित करता है। अध्ययन 1900 से 1923 के मध्य रचित लेनिन के निबंधों, पत्रों, नोट्स और भाषणों के आधार पर यह स्पष्ट करता है कि उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा भारत के आर्थिक शोषण, दमनकारी नीतियों और बंबई के मजदूर आंदोलन की क्रांतिकारी चेतना का गहन मूल्यांकन किया था। लेनिन ने औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के मूल लोकतांत्रिक स्वरूप को पहचानते हुए भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक सर्वहारा क्रांति और एशियाई जन-एकता से जोड़ा। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के मंच से मानबेंद्रनाथ रॉय के संकीर्णतावादी सिद्धांतों को संशोधित कर लेनिन ने भारतीय कम्युनिस्टों को व्यापक साम्राज्यवादी-विरोधी मंचों में भागीदारी और किसान-मजदूर आंदोलनों को संगठित करने की रणनीतिक दिशा प्रदान की। अंततः, यह आलेख स्थापित करता है कि लेनिन के अनुसार रूस, भारत, चीन आदि देशों का दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का मालिक होना ही संघर्ष के परिणाम को तय करेगा।

केशव कुमार भट्टड़ • 13 अक्टूबर 2026

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