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'प्रेमचंद: एक जीवन':चेतना और मूल्यों की बेमिसाल मिसाल ~ केशव भट्टड़

केशव कुमार भट्टड़•05 अगस्त 20269 मिनट पठन194 बार पढ़ा गया

यह तथ्य अत्यंत दुखद और विचारणीय है कि इतने गहन शोध, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक और इरफ़ान ख़ान जैसे शानदार अभिनेता की कलात्मक निष्ठा से निर्मित यह ऐतिहासिक फिल्म धरोहर आज प्रसार भारती (दूरदर्शन) के अभिलेखागारों (Archives) में कहीं धूल फाँक रही है। अफसर ना सुनते हैं, ना सुध लेते हैं , यहाँ तक कि अनगिनत पत्राचार और सुझावों के बावजूद इसे किसी भी डिजिटल या प्रसारण माध्यम पर उपलब्ध कराया जाना तो दूर की बात , ई-मेल और पत्रों का जबाब तक नहीं मिलता- छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त , अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक गुलबहार सिंह ने दुखी मन से बताया - यह एक गहरे अनैतिक - प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक - अपराध के समान है।
आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।

'प्रेमचंद: एक जीवन':चेतना और मूल्यों की बेमिसाल मिसाल ~ केशव भट्टड़

निर्देशक गुलबहार सिंह की डॉक्यूमेंटरी फिल्म

'प्रेमचंद: एक जीवन'

प्रगतिशील चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों की बेमिसाल मिसाल

भारतीय साहित्य के अप्रतिम शिखर, कथाकार प्रेमचंद को पूरी दुनिया में सामाजिक सरोकारों, मानवीय संवेदनाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों के अप्रतिम संवाहक के रूप में पूरी गंभीरता से लिया जाता है। अतएव, उनके जीवन और विचार-दर्शन पर केंद्रित किसी भी कलात्मक प्रयास से भी उसी स्तर की गंभीरता और सृजनात्मक शुचिता की अपेक्षा की जाती है। कोलकाता स्थित नेशनल लाइब्रेरी के ऐतिहासिक भाषा भवन परिसर में प्रेमचंद की 146वीं जयंती के अवसर पर दूरदर्शन के लिए निर्मित एक-एक घंटे के चार भागों का ऐतिहासिक वृत्तचित्र फ़िल्म 'प्रेमचंद: एक जीवन' के विशेष प्रदर्शन ने कला और साहित्य-जगत में एक नई चेतना का संचार किया। इस गरिमामय आयोजन में उपस्थित होकर फ़िल्म के कलात्मक प्रवाह को गहराई से अनुभव करने का अवसर मिला।

निर्देशक का दृष्टिकोण, सिनेमाई बिम्ब का यथार्थ

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक गुलबहार सिंह (जिन्होंने 'द गोल', 'द चेकमेट' और '6 दिसंबर' जैसी कालजयी और उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों के माध्यम से भारतीय सिनेमा को नई वैचारिक दिशा दी है) ने इस वृत्तचित्र को एक साधारण व्यावसायिक परियोजना की तरह नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक मिशन' की तरह पूरा किया है। फ़िल्म को देखते हुए यह स्पष्ट आभास होता है कि पटकथा लेखक रशीद इक़बाल और निर्देशक गुलबहार सिंह के चेतना-मन में प्रेमचंद हर क्षण सजीव रहकर डेरा डाले हुए थे। फ़िल्म का स्थापत्य सादगी में भव्यता की मिसाल प्रस्तुत करता है। सीमित और न्यून बजट के बावजूद निर्देशक ने दृश्यों को वास्तविक लोकेशनों पर शूट कर उनमें एक नैसर्गिक, आत्मीय और जीवंत सौंदर्य पिरोया है।

चरखे, कतली और ऐनक का सिनेमाई बिम्ब

फ़िल्म के सिनेमाई शिल्प में एक बिम्ब बार-बार दर्शकों के सामने आता है—घूमता हुआ बड़ा चरखा, सूत काटती छोटी चरखी/कतली, उससे निकलता मोटा कच्चा धागा और पास ही रखी काले फ्रेम की गोल ऐनक कैमरा पहले घूमते बड़े चरखे पर ध्यान केंद्रित करता है और फिर पैन (Pan) होते हुए छोटे चरखे और ऐनक को एक ही फ्रेम में समेट लेता है। पल भर के लिए फ्रीज़ होता यह दृश्य केवल स्वदेशी या गांधीवादी विचार का प्रतीक भर नहीं है, बल्कि यह प्रेमचंद की जीवन-दृष्टि का दार्शनिक प्रकटीकरण है:

• घूमता चरखा और धागा: यह प्रेमचंद के सतत संघर्षशील जीवन, श्रमजीवी संस्कृति और समाज के अंतिम व्यक्ति से जुड़े उनके ताने-बाने का प्रतीक है।

• गोल ऐनक: यह उस यथार्थवादी पारदर्शी दृष्टि की परिचायक है, जिससे प्रेमचंद ने बिना किसी पूर्वाग्रह के औपनिवेशिक शोषण, जातिगत दंश और सांप्रदायिकता को नग्न रूप में देखा।

• फ्रीज़ होता फ्रेम: यह दर्शक को ठहरकर यह सोचने पर मजबूर करता है कि प्रेमचंद का साहित्य किस प्रकार श्रम, विचार और दृष्टि का अनूठा संगम था।

पार्श्व में गूँजती संयत धुनें, प्राकृतिक रोशनी का सटीक उपयोग, कैमरे के संवेदनशील कोण और आकाशवाणी से जुड़े प्रीतम खन्ना की गंभीर व लयबद्ध आवाज़ फ़िल्म को बगैर लाउड हुए एक शास्त्रीय गहराई प्रदान करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कैमरे का कोण और बैकग्राउंड स्कोर स्वयं इस वृत्तचित्र के मूक चरित्र बन गए हैं।

इरफ़ान ख़ान का अभिनय: प्रेमचंद की जीवंत अभिव्यक्ति

भारतीय सिनेमा के सर्वकालिक महान अभिनेताओं में शुमार दिवंगत इरफ़ान ख़ान ने प्रेमचंद की भूमिका को केवल अभिनीत नहीं किया है, बल्कि अपनी आत्मिक शक्ति से उसे परदे पर पुनर्जीवित कर दिया है। इरफ़ान का यह अविस्मरणीय अभिनय भारतीय सिनेमा का एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है:

• तनाव और मस्ती का संतुलन: इरफ़ान ने एक तरफ प्रेमचंद के जीवन की घोर आर्थिक तंगहाली और उनके स्वाभिमान, प्रेस के कर्ज़ और रचना प्रक्रिया के गंभीर मानसिक तनाव को अपनी आँखों के आभामंडल से उकेरा है, तो दूसरी तरफ अपने प्रिय मित्रों की महफ़िल में उनकी निश्छल हँसी और बेफ़िक्र मस्ती को भी उतनी ही सहजता से जीवंत किया है।

• पारिवारिक सरोकार: पत्नी शिवरानी देवी के साथ साहित्यिक और पारिवारिक संवादों में इरफ़ान ने प्रेमचंद के सहृदय, आधुनिक और समतावादी पति के रूप को अत्यंत प्रामाणिक रूप से उभारा है।

• मृत्यु का अंतिम दृश्य: फ़िल्म का सबसे मार्मिक और गहरा प्रभाव छोड़ने वाला क्षण प्रेमचंद की अंतिम सांसों और मृत्यु का दृश्य है। इरफ़ान की शारीरिक भाषा और मुखमुद्रा दर्शक के भीतर एक ऐसी बैचेन कर देने वाली उदासी और शून्यता भर देती है, जो फ़िल्म समाप्त होने के बाद भी देर तक पीछा करती है।

इरफ़ान के साथ-साथ टॉम अल्टर, संजीव शुक्ला, अशोक मेहरा, सुधीर निगम, मंजुला सिंह, पुण्य दर्शन गुप्ता, प्रेम मोदी और कृष्ण कुमार पार्थ जैसे मंझे हुए रंगकर्मियों का सहज अभिनय यह सिद्ध करता है कि निर्देशक और कलाकारों के बीच पटकथा के साथ एकाकार होने का अद्भुत तादादम्‍य था।

लमही से बंबई: यथार्थवादी जीवन-यात्रा और औपनिवेशिक प्रतिरोध

वाराणसी के लमही गाँव में जन्मे धनपत राय का जीवन प्रारंभिक बाल्यकाल से ही अभावों, कुरीतियों और पारिवारिक त्रासदियों के बीच बीता। डाकघर की साधारण क्लर्की से लेकर शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर बनने तक, उन्होंने भारतीय समाज के भीतर पसरी आर्थिक विषमता और ब्रिटिश हुकूमत के औपनिवेशिक दमन को बहुत करीब से देखा।

1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी सरकारी नौकरी का परित्याग करना प्रेमचंद के स्वाधीनता संग्राम और स्वाभिमानी लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा का परिचायक था। फ़िल्म उन तमाम ऐतिहासिक पड़ावों—गोरखपुर, कानपुर, बनारस, लखनऊ और बंबई को प्रमाणिकता से परदे पर लाती है। जब बंबई के पूंजीवादी फ़िल्मी तंत्र ने उनकी सामाजिक और जनवादी अभिव्यक्ति पर पाबंदी लगानी चाही, तो उन्होंने उस बाज़ारी चमक-दमक को तत्काल ठुकरा दिया और पुनः बनारस लौटकर अपनी स्वाभिमानी कलम के माध्यम से जनसेवा का मार्ग चुना। सरस्वती प्रेस की स्थापना और 'हंस' व 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं के संपादन में प्रेमचंद ने जीवन भर आर्थिक घाटा सहा और महाजनों के ऋण से दबे रहे, किंतु उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से , लेखन से समझौता नहीं किया।

सामाजिक सुधार, पारिवारिक संबल और कालजयी रचना संसार

प्रेमचंद का संपूर्ण जीवन धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील सामाजिक सुधारों की प्रत्यक्ष मिसाल था। उस कठोर पारंपरिक युग में एक बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह करना उनके विचारों और आचरण की एकरूपता को सिद्ध करता है। शिवरानी देवी केवल उनकी पत्नी नहीं थीं, बल्कि उनके वैचारिक सुधार अभियानों की रीढ़ थीं। फ़िल्म में प्रेमचंद के पारिवारिक जीवन के दुखों का संवेदनशील चित्रण है; फ़िल्म में पुत्री कमला देवी की असमय मृत्यु के वज्रपात से लेकर जीवित संतानों (श्रीपत राय और अमृत राय) के पालन-पोषण और उनके वैचारिक विकास का अत्यंत संवेदनशील अंकन हुआ है। दया नारायण निगम (जिन्होंने उन्हें 'प्रेमचंद' नाम दिया), जयशंकर प्रसाद, जैनेंद्र कुमार और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जैसे मूर्धन्य विचारकों के साथ उनके आत्मीय संबंध फ़िल्म में उभरते हैं। 1936 में लखनऊ में 'प्रगतिशील लेखक संघ' के प्रथम ऐतिहासिक अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए प्रेमचंद ने भारतीय साहित्य को नया लोकतांत्रिक क्षितिज दिया, जहाँ उन्होंने उद्घोष किया कि "साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।"

'नवाब राय' नाम से लिखित उनका पहला कहानी संग्रह 'सोज़े वतन' (1908) ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ज़ब्त कर जला दिया गया था, किंतु इस दमन से उनकी कलम और पैनी हो गई। 'सेवा सदन', 'रंगभूमि', 'कर्मभूमि', 'ग़बन' और 'गोदान' जैसे कालजयी उपन्यासों तथा 'कफ़न', 'पूस की रात', 'सद्गति', 'ठाकुर का कुआँ', 'ईदगाह' और 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसी कालजयी कहानियों के माध्यम से उन्होंने किसानों, दलितों, महिलाओं और मज़दूरों के अधिकारों की जो अलख जगाई, वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। प्रेमचंद का संपूर्ण सृजन भारतीय समाज के हर वंचित वर्ग की आवाज़ है। यह फिल्म इन सबको छूकर स्पंदित करते हुए अपनी गति बनाए रखती है।

प्रसार भारती की उपेक्षा: लोकतांत्रिक चेतना और वर्तमान प्रासंगिकता

वृत्तचित्र फ़िल्म 'प्रेमचंद: एक जीवन' के प्रसारण के संबंध में निर्देशक गुलबहार सिंह बताते हैं कि यह चार भागों की वृत्तचित्र श्रृंखला सबसे पहले दूरदर्शन (DD-3) पर 1996 में प्रसारित की गई थी। पहली बार के सफल प्रसारण के बाद, दर्शकों की माँग पर दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क (DD-1) द्वारा इसे एक बार फिर दिखाया गया। यह प्रसारण अंतिम था। बाद के वर्षों में दूरदर्शन और प्रसार भारती द्वारा इस ऐतिहासिक वृत्तचित्र के प्रसारण या इसे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म/ आधिकारिक डिजिटल आर्काइव / यूट्यूब चैनल या सार्वजनिक अभिलेखागार में उपलब्ध कराने को लेकर उदासीनता देखी गई। जिसके कारण आज यह अमूल्य कृति सुलभ नहीं है। यह तथ्य अत्यंत दुखद और विचारणीय है कि इतने गहन शोध, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक और इरफ़ान ख़ान जैसे शानदार अभिनेता की कलात्मक निष्ठा से निर्मित यह ऐतिहासिक फिल्म धरोहर आज प्रसार भारती (दूरदर्शन) के अभिलेखागारों (Archives) में कहीं धूल फाँक रही है। अफसर ना सुनते हैं, ना सुध लेते हैं , यहाँ तक कि अनगिनत पत्राचार और सुझावों के बावजूद इसे किसी भी डिजिटल या प्रसारण माध्यम पर उपलब्ध कराया जाना तो दूर की बात , ई-मेल और पत्रों का जबाब तक नहीं मिलता- छह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त , अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त निर्देशक गुलबहार सिंह ने दुखी मन से बताया - यह एक गहरे अनैतिक - प्रशासनिक, सामाजिक और सांस्कृतिक - अपराध के समान है।

आज के दौर में जब मुख्यधारा के मीडिया और फ़िल्मों का एक बड़ा वर्ग समाज में वैमनस्य, नफ़रत, शोर और विभाजन फैलाने का औजार बनता जा रहा है, डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘प्रेमचंद – एक जीवन’ यह सिद्ध करती है कि धर्म, भाषा और संस्कृति कभी भी भारतीय जनमानस में नफ़रत का आधार नहीं रहे हैं। फ़िल्म का हर फ्रेम सादगी में भव्यता की कहानी कहता है और एक शांत, गंभीर, कल-कल बहती नदी की तरह दर्शक को अपने साथ बहा ले जाता है। निर्माण के दौरान निर्देशक गुलबहार सिंह को जिस सुकून और निर्झर आनंद की अनुभूति हुई होगी, वह इस फ़िल्म के एक-एक फ्रेम में छलकती है। यह फ़िल्म देश के प्रत्येक स्कूल, विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक मंचों पर अनिवार्य रूप से दिखाई जानी चाहिए। प्रसार भारती को अविलंब इस अमूल्य धरोहर को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना चाहिए ताकि देश की नई पीढ़ी प्रेमचंद के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत के सपने से जुड़ सके।

पढ़ें: हिन्दी फिल्म 'सतलुज' पर केशव भट्टड़ का समीक्षा लेख
पढ़ें : हिन्दी फिल्म 'आर्टिकल 15 (2019) पर केशव भट्टड़ का समीक्षा आलेख

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'प्रेमचंद: एक जीवन':चेतना और मूल्यों की बेमिसाल मिसाल ~ केशव भट्टड़

प्रकाशित: 05 अगस्त 2026 • 9 मिनट पठन

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इस मानसिकता का परत-दर-परत विश्लेषण जरूरी हो जाता हैं।

“माई कहा करती थी सर , समाज का एक ठो विधान होता है.. राजा होता है.. प्रजा होती है.. सेवक होता है.. दास होता है। इस सबका संतुलन है सर एक… ब्रह्मा जी ने बनाया है…संस्कृत में। हमको कोई अधिकार नहीं है, इस संतुलन को बिगाड़ने का। और सर... सब बराबर हो जाएंगे तो फिर राजा कौन बनेगा ? “ - “लेकिन राजा बनाना ही क्यों है ?” नायक-नायिका (पुलिस-पत्रकार हैं ) का चिंतन उभर कर सामने आता है।

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