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चोरबागान हादसा! इस कुव्यवस्था का दोषी कौन?

राजीव कुमार पाण्डेय•18 अक्टूबर 20263 मिनट पठन18 बार पढ़ा गया

सरकार शुरू से ही आत्मप्रचार में लगी रही। मुख्य सड़कों को बंद करके विभिन्न तरह के तमाशे किए गए। जहाँ सड़कों की मरम्मत की जरूरत थी, वहाँ मरम्मत छोड़कर सड़कों को विभिन्न रंगों से रंगने पर पैसे खर्च किए गए, जिसकी वजह से सड़कें चिकनी हो गईं और बरसात होते ही मोटरबाइक सवार सड़क पर फिसलकर गिरने लगे। उसी आत्मप्रचार में सरकार ने इस बार पूरे राज्य में 12,400 नए पूजा पंडालों को मंजूरी दे दी, जिसकी वजह से रास्ते और कम हो गए और भीड़ को काबू करना मुश्किल काम बन गया।

आत्मप्रचार में फंसी इस सरकार ने शुरू से ही एक एजेंडे के तहत वामदलों द्वारा लगाए जाने वाले प्रगतिशील पुस्तक बिक्री केंद्र को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। तरह-तरह के उपाय किए गए और पुलिस बल को इस काम में भी लगा दिया गया कि किसी भी तरह वामपंथी किताबें न बिकने पाएँ। पुलिस बल का एक हिस्सा तो इसी काम में लगा रहा, फलस्वरूप भीड़ नियंत्रण और जनता की सुरक्षा हाशिए पर चली गई।

चोरबागान हादसा! इस कुव्यवस्था का दोषी कौन?

कल शाम कोलकाता के प्रसिद्ध राममंदिर अंचल के पास स्थित चोर बागान पूजा पंडाल में हुई भगदड़ में लोग मारे गए और 40 के करीब बुरी तरह घायल हो गए जिनका की अब भी पास के ही मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज चल रहा हैं। बंगाल में पूजा पंडाल का इतिहास सदियों पुराना है। विश्व प्रसिद्ध इस त्योहार में विभिन्न राज्यों समेत पूरी दुनिया के लोग जमा होते हैं और पूरा शहर उत्सव के आनंद में डूब जाता है। अथाह भीड़ होती है, लेकिन सब कुछ व्यवस्थित रहता है। चोर बागान का यह पूजा पंडाल भी करीब 90 साल पुराना है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, व्यवस्था में ऐसी कोताही पहले कभी नहीं देखी गई थी। राज्य प्रशासन, पुलिस और स्थानीय पूजा आयोजक संयुक्त रूप से सारी व्यवस्था संभालते हैं। चोर बागान पूजा पंडाल, जहाँ यह घटना घटी, वहाँ के पूजा पंडाल की इस बार की थीम थी “बियोंड द साउंड” यानी शोर या ध्वनि से परे। लेकिन चारों तरफ क्रूर चीत्कार और अफरा-तफरी के बीच यह दुर्घटना सामने आई।

पूजा शुरू होने के काफी पहले से आरएसएस-परिचालित और भाजपा-संचालित इस सरकार की एक ही प्राथमिकता थी और वह यह थी कि कैसे अपने कुत्सित एजेंडे का प्रचार व विस्तार हो। इसके लिए बेतहाशा पैसे खर्च किए जा रहे थे और उन पैसों से ऊलजलूल परियोजनाएं लागू की जा रही थीं। बंगाल में शरद ऋतु के ठीक पहले वर्षा काल रहता है, जिसकी वजह से सड़कें अक्सर टूट-फूट जाती हैं। शरदोत्सव के ठीक पहले और आने वाली भीड़ के स्वागत में सड़कें, स्ट्रीट लाइट्स वगैरह ठीक कर दी जाती हैं ताकि भीड़ को किसी तरह की असुविधा न हो और सड़क परिवहन ठीक रहे। लेकिन यह सब न करके बंगाल में बनी नई भाजपा सरकार शुरू से ही आत्मप्रचार में लगी रही। मुख्य सड़कों को बंद करके विभिन्न तरह के तमाशे किए गए। जहाँ सड़कों की मरम्मत की जरूरत थी, वहाँ मरम्मत छोड़कर सड़कों को विभिन्न रंगों से रंगने पर पैसे खर्च किए गए, जिसकी वजह से सड़कें चिकनी हो गईं और बरसात होते ही मोटरबाइक सवार सड़क पर फिसलकर गिरने लगे। उसी आत्मप्रचार में सरकार ने इस बार पूरे राज्य में 12,400 नए पूजा पंडालों को मंजूरी दे दी, जिसकी वजह से रास्ते और कम हो गए और भीड़ को काबू करना मुश्किल काम बन गया।

आत्मप्रचार में फंसी इस सरकार ने शुरू से ही एक एजेंडे के तहत वामदलों द्वारा लगाए जाने वाले प्रगतिशील पुस्तक बिक्री केंद्र को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। तरह-तरह के उपाय किए गए और पुलिस बल को इस काम में भी लगा दिया गया कि किसी भी तरह वामपंथी किताबें न बिकने पाएँ। पुलिस बल का एक हिस्सा तो इसी काम में लगा रहा, फलस्वरूप भीड़ नियंत्रण और जनता की सुरक्षा हाशिए पर चली गई। मौसम विभाग द्वारा काफी पहले ही बारिश की संभावना का अलर्ट देने के बावजूद कहीं कोई प्रशासनिक तैयारी नहीं की गई थी। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब बारिश शुरू हुई, तब लोग बारिश से बचने के लिए पंडाल की तरफ भागे। उन रास्तों पर फिसलन थी, निकलने का रास्ता संकरा था और उस तरफ रोशनी भी ज्यादा नहीं थी। आसपास पुलिस बल की भी मौजूदगी नहीं थी क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्री का उसी शाम कोलकाता आगमन हुआ था, तो अधिकतर पुलिसकर्मी उनकी सुरक्षा में लगे हुए थे। इन सब नाकामियों ने 19 जानें ले लीं और कईयों के घर उजाड़ दिए। अब सरकार अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने और बातों को घुमाने में लगी है। गृह मंत्री ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया है और सरकार मृत और घायलों को पैसे बांटकर ध्यान भटकाने में लगी है।

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प्रकाशित: 18 अक्टूबर 2026 • 3 मिनट पठन

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आज जब देश में धर्म और संस्कृति का शोर सबसे ऊँचा है, तब उसी समाज की अंतरात्मा के भीतर बेईमानी की ऐसी भूख नाच रही है जो बच्चों की लाशों पर भी करोड़ों की गड्डियाँ गिनने से नहीं हिचकती।यह कैसी धार्मिक चेतना है जहाँ नारे तो भगवान के लगते हैं, लेकिन आचरण में केवल शैतानी हवस और भ्रष्टाचार का बोलबाला है?नीट पेपर लीक की यह आग सिर्फ परीक्षा प्रणाली की नहीं,बल्कि देश के नैतिक और सामाजिक ढांचे की भस्म उड़ा रही है।जब मेधावी छात्र फंदे पर झूल रहे हों,अस्मत के लिये छात्राएं गुरु से जूझ रही हों, और मगरमच्छ तिजोरियाँ भर रहे हों, तब चुप रहना इस महापाप में हिस्सेदार होना है!"

केशव कुमार भट्टड़ • 16 मई 2026

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अंधाधुंध हॉकर उन्मूलन नहीं, पुनर्वास चाहिए.!.

साल 2014 का Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act देश के स्ट्रीट वेंडरों की आजीविका के अधिकार को मान्यता देता है। लेकिन रेल हॉकर अभी भी इस सुरक्षा से बाहर हैं। जबकि भारतीय रेलवे के साथ उनका रिश्ता कई दशकों पुराना है। ट्रेन यात्रा की संस्कृति के साथ झालमूड़ी , चनाचूर, चाय, मूंगफली, किताबें या खिलौने बेचने वाले रचे-बसे हुए हैं। वे सिर्फ सामान नहीं बेचते; वे रेल यात्रा की एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता हैं।

इसलिए रेल हॉकरों की मांग पूरी तरह जायज है—लाइसेंस देकर पेशे को मान्यता दी जाए, पुनर्वास के बिना कोई उन्मूलन न हो, उन्हें Street Vendors Act के दायरे में लाया जाए, सामाजिक सुरक्षा, ईएसआई (ESI) और भविष्य निधि (प्रॉविडेंट फंड) में शामिल किया जाए, विकास के नाम पर आजीविका नष्ट न की जाए।

इस लड़ाई में 'पश्चिम बंगाल रेलवे हॉक्टर्स यूनियन' (CITU) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। लंबे समय से यह संगठन रेल हॉकरों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है। राजनीतिक आतंक, प्रशासनिक उत्पीड़न, जबरन यूनियन पर कब्जा—इन सबके खिलाफ उन्होंने रेल हॉकरों को एकजुट करने का प्रयास किया है। अलग-अलग समय पर तृणमूल समर्थक यूनियनों के हमलों, धमकियों और यहां तक कि सदस्यों को जबरन दल-बदल कराने की कोशिशों के खिलाफ भी उन्होंने कड़ा प्रतिरोध खड़ा किया है।

केशव कुमार भट्टड़ • 20 मई 2026

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